
सनातन हिंदू धर्म में खान-पान और शुद्धता को लेकर सदियों से कई तरह की मान्यताएं और परंपराएं चली आ रही हैं। शास्त्रों में शाकाहारी और सात्विक भोजन को मनुष्य के मानसिक व आध्यात्मिक विकास के लिए सर्वोत्तम (उत्तम) माना गया है, लेकिन समाज में मांसाहार को लेकर अक्सर लोगों के मन में कई तरह के संशय और दुविधाएं बनी रहती हैं।
इसी दुविधा से जुड़ा एक बेहद व्यावहारिक सवाल एक भक्त ने वृंदावन के विख्यात और परम पूज्य संत श्री प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज से पूछा। भक्त ने पूछा, “महाराज जी, अगर हम मंदिर से लाया हुआ भगवान का पवित्र प्रसाद किसी ऐसे व्यक्ति को देते हैं जो मांसाहारी है या अभक्ष (न खाने योग्य) पदार्थों का सेवन करता है, तो क्या ऐसा करने से उस पाप के भागीदार हम तो नहीं बनेंगे?” आइए जानते हैं अध्यात्म के मार्ग पर लाखों युवाओं को राह दिखाने वाले प्रेमानंद महाराज जी ने इसका क्या सटीक समाधान दिया।
मांसाहारी व्यक्ति को प्रसाद देने से पाप नहीं, बल्कि मिलेगा महापुण्य!
पूज्य प्रेमानंद महाराज जी ने भक्त के इस संशय को पूरी तरह दूर करते हुए कहा कि नहीं, ऐसा करने से आपको रत्ती भर भी पाप नहीं लगेगा। महाराज जी ने बल्कि यह नसीहत दी कि ऐसे लोगों को तो भगवान का प्रसाद ढूंढकर जरूर देना चाहिए।
इसके पीछे का गहरा आध्यात्मिक कारण बताते हुए महाराज जी ने कहा कि यदि कोई मांसाहारी या तामसिक प्रवृत्ति का व्यक्ति पूरी श्रद्धा और आदर के साथ भगवान का प्रसाद ग्रहण करता है, तो उस महाप्रसाद के प्रभाव से धीरे-धीरे उसकी ‘बुद्धि शुद्ध’ होने लगती है। प्रसाद में वह दिव्य शक्ति होती है जो मनुष्य के भीतर के अंधकार को मिटाती है। महाराज जी ने विश्वास जताते हुए कहा कि प्रसाद के इसी पवित्र प्रभाव के कारण वह व्यक्ति एक दिन अपने सारे गंदे आचरण, अभक्ष भोजन और तामसिक आदतें हमेशा के लिए छोड़ देगा और सात्विक मार्ग पर आ जाएगा।
चरणामृत और भगवत प्रसाद में है बुद्धि को पवित्र करने की दिव्य शक्ति
महाराज जी ने प्रसाद की महिमा का गुणगान करते हुए आगे कहा:
“भगवान का चरणामृत और भगवत प्रसाद, ये दोनों ही चीजें सीधे मनुष्य के अंतःकरण और बुद्धि को पवित्र करती हैं। इसलिए यदि हम समाज के ऐसे (मांसाहार करने वाले) लोगों को भी प्रसाद बांटते हैं, तो हमें संकोच नहीं करना चाहिए। बस एक बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि सामने वाला व्यक्ति भगवान के उस प्रसाद का अनादर या अपमान न करे।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर कोई व्यक्ति आदर भाव से प्रसाद मुख में डाल लेता है, तो उसे प्रसाद देने वाले को पाप नहीं, बल्कि महापुण्य की प्राप्ति होती है। जब उस व्यक्ति के प्रसाद खाने से पुराने पाप नष्ट होंगे, तो उसकी बुद्धि स्वतः ही सात्विक विचारों की ओर अग्रसर होगी और अंततः उसका कल्याण मार्ग प्रशस्त होगा।
संसार के सभी दुखों की अचूक औषधि है ‘नाम जप’
खान-पान के नियमों से आगे बढ़कर प्रेमानंद महाराज जी ने ‘भगवन नाम जप’ की महिमा पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य चाहे पवित्र अवस्था में हो या अपवित्र अवस्था में, भगवान का नाम लेने के लिए कोई कड़ा नियम या विधि-निषेध का बंधन आड़े नहीं आता।
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हर स्थिति में करें जप: मनुष्य को उठते-बैठते, चलते-फिरते, खाते-पीते और सोते-जागते यानी जीवन के हर क्षण में निरंतर भगवान के नाम का स्मरण और जप करते रहना चाहिए। इसी से जीव का परम कल्याण संभव है।
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ब्रह्म से भी बढ़कर है नाम: महाराज जी के अनुसार, इस घोर संसार रूपी रोग की एकमात्र अचूक औषधि ‘भगवन नाम’ ही है। यह दिव्य नाम तो स्वयं साक्षात ब्रह्म से भी बढ़कर सामर्थ्य रखता है। यह नाम जप साधक के भीतर वह शक्ति प्रकट कर देता है कि वह वर देने वाले अपने आराध्य प्रभु को भी प्रेम वश आशीष दे सकता है।
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नाम ही साधन, नाम ही साध्य: महाराज जी ने भावुक होते हुए कहा, “वे उपासक इस कलिकाल में बेहद भाग्यशाली हैं, जिनकी भगवान के नाम में अटूट श्रद्धा हो गई है। हमारा तो पूरा जीवन, हमारा साध्य (लक्ष्य) और हमारा साधन (मार्ग) सब कुछ केवल प्रभु का नाम ही है। हमारे हृदय में इस नाम के सिवाय अन्य किसी भी लोक, परलोक या साधन का कोई महत्व नहीं है।”
अंत में महाराज जी ने गुरु कृपा का महत्व बताते हुए कहा कि गुरु की असीम कृपा से हृदय में बस एक ही बात दृढ़ता से बैठ गई है कि जीवन का एक भी सेकंड ऐसा खाली न जाए, जिसमें हम अपने प्राणप्रिय प्रभु का नाम भूल जाएं।
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