जब जुबली कुमार ने अपनी ही जिद तोड़ मोहम्मद रफी की जगह मुकेश को चुना, नौशाद भी रह गए थे हैरान

भारतीय सिनेमा के इतिहास में 60 और 70 का दशक अभिनेता राजेंद्र कुमार के नाम रहा है। बॉक्स ऑफिस पर उनकी सफलता का आलम यह था कि उनकी लगभग हर फिल्म थिएटरों में कम से कम 25 हफ्ते यानी सिल्वर जुबली मनाती थी, जिसके चलते उन्हें प्यार से ‘जुबली कुमार’ कहा जाने लगा। राजेंद्र कुमार की इस अभूतपूर्व सफलता के पीछे जितना योगदान उनकी अदाकारी का था, उतना ही बड़ा हाथ उनकी फिल्मों के सदाबहार गानों का था।

उस दौर में राजेंद्र कुमार का स्क्रीन अंदाज और शहंशाह-ए-तरन्नुम मोहम्मद रफी की जादुई आवाज एक-दूसरे के पर्याय बन चुके थे। दोनों की जुगलबंदी का मतलब होता था – एक गारंटीड ब्लॉकबस्टर गाना। लेकिन इसी बीच एक ऐसा वक्त भी आया, जब राजेंद्र कुमार ने एक फिल्म के लिए रफी साहब को छोड़कर मुकेश को साइन करने का फैसला किया, जिसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को सख्ते में डाल दिया था।

रफी और राजेंद्र कुमार: जब लोग समझने लगे एक-दूसरे का पूरक

मोहम्मद रफी ने राजेंद्र कुमार के करियर को ऊंचाइयों पर ले जाने में बेहद अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने जुबली कुमार के लिए एक से बढ़कर एक कल्ट गाने गाए, जो आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं:

  • “बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है…”

  • “ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर कि तुम नाराज ना होना…”

  • “ऐ नर्गिसे मस्ताना…”

इन गानों की दीवानगी इस कदर थी कि दर्शक और समीक्षक यह मानने लगे थे कि राजेंद्र कुमार का ऑन-स्क्रीन जादू मोहम्मद रफी की आवाज के बिना अधूरा और असंभव है। खुद राजेंद्र कुमार भी पहले अपनी हर फिल्म में रफी साहब को ही लेने की जिद किया करते थे।

फिल्म ‘साथी’ और संगीतकार नौशाद के सामने रखी वो ‘शर्त’

सस्पेंस और हैरानी का यह दौर तब शुरू हुआ जब फिल्म ‘साथी’ की तैयारियां चल रही थीं। इस फिल्म के संगीत की कमान उस दौर के सबसे दिग्गज और संजीदा संगीतकार नौशाद अली के हाथों में थी। फिल्म की कास्टिंग के बाद राजेंद्र कुमार ने नौशाद साहब के सामने एक अजीब और चौंकाने वाली शर्त रख दी। उन्होंने कहा कि— “इस फिल्म के सभी गाने मोहम्मद रफी नहीं, बल्कि मुकेश गाएंगे।”

नौशाद साहब की हैरानी: राजेंद्र कुमार के मुंह से यह बात सुनकर नौशाद बेहद हैरान रह गए। कुछ समय पहले तक जो अभिनेता रफी साहब के बिना काम करने को तैयार नहीं था, वह अचानक मुकेश के नाम की जिद कर रहा था। कई सहकर्मियों और करीबियों ने नौशाद साहब से गुजारिश भी की कि वे राजेंद्र कुमार को समझाएं और गानों में रफी साहब की ही वापसी कराएं, लेकिन नौशाद जानते थे कि जुबली कुमार अपनी बात के पक्के हैं और उनकी इस जिद के पीछे कोई ठोस वजह है।

कोई मनमुटाव नहीं, बल्कि ‘किरदार का दर्द’ थी असली वजह

जब इंडस्ट्री में यह खबर फैली, तो गलियारों में तरह-तरह की अफवाहें उड़ने लगीं कि क्या मोहम्मद रफी और राजेंद्र कुमार के बीच कोई आपसी अनबन या मनमुटाव हो गया है? हालांकि, बाद में स्थिति पूरी तरह साफ की गई।

दोनों दिग्गजों के बीच कोई कड़वाहट नहीं थी। यह विशुद्ध रूप से राजेंद्र कुमार का बतौर एक संजीदा अभिनेता (Actor) लिया गया फैसला था। फिल्म ‘साथी’ में राजेंद्र कुमार का जो किरदार था, उसमें एक बेहद गहरा मानसिक दर्द और भावुकता (Melancholy) थी। राजेंद्र कुमार का मानना था कि उनके इस विशेष किरदार की गहराई, तन्हाई और दर्द को पर्दे पर अगर कोई आवाज सबसे बेहतरीन तरीके से जीवंत कर सकती है, तो वो केवल मुकेश की वियोगभरी और मर्मस्पर्शी आवाज ही है।

ब्लॉकबस्टर साबित हुआ जुबली कुमार का यह जुआ

दिलचस्प और सुखद बात यह रही कि राजेंद्र कुमार का अपनी कला को लेकर लिया गया यह जोखिम शत-प्रतिशत सही साबित हुआ। फिल्म ‘साथी’ रिलीज हुई और इसके गाने रातों-रात ब्लॉकबस्टर हो गए। मुकेश ने इस फिल्म के माध्यम से हिंदी सिनेमा को बेहद खूबसूरत नगीने दिए:

  • “मेरा प्यार भी तू है, ये बहार भी तू है…”

  • “उसने जाना कि हम कश्ती-ए-दिल…”

इन गानों को आज भी मुकेश के करियर के सर्वश्रेष्ठ गीतों में गिना जाता है और इसने साबित किया कि राजेंद्र कुमार की किरदारों को समझने की परख कितनी लाजवाब थी।

हर विधा के ऑलराउंडर थे मोहम्मद रफी साहब

भले ही इस फिल्म में मुकेश ने जादू बिखेरा, लेकिन मोहम्मद रफी साहब की सर्वव्यापकता पर कभी कोई आंच नहीं आई। रफी साहब को फिल्म इंडस्ट्री का असली ‘ऑलराउंडर’ गायक कहा जाता था। वे जितने परफेक्शन के साथ हाई-एनर्जी पार्टी सॉन्ग गाते थे, उतनी ही शिद्दत से वे सैड सॉन्ग, रोमांटिक मेलोडी, देशभक्ति गीत, कव्वाली और गजलें भी गा देते थे। उनकी जादुई आवाज के लिए उन्हें:

  1. कई प्रतिष्ठित फिल्मफेयर अवॉर्ड्स से नवाजा गया।

  2. फिल्म ‘हम किसी से कम नहीं’ के गाने (क्या हुआ तेरा वादा) के लिए नेशनल फिल्म अवॉर्ड (राष्ट्रीय पुरस्कार) मिला।

  3. भारत सरकार द्वारा उन्हें ‘पद्मश्री’ सम्मान से भी विभूषित किया गया।

भारी बारिश में 10 हजार प्रशंसकों ने दी थी अंतिम विदाई

मोहम्मद रफी की लोकप्रियता और लोगों के दिलों में उनके प्रति दीवानगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब इस महान फनकार ने दुनिया को अलविदा कहा, तो उनकी अंतिम विदाई (जनाजे) में 10,000 से ज्यादा लोग शामिल होने सड़कों पर उतर आए थे।

उस दिन मुंबई में बेहद भारी और मूसलाधार बारिश हो रही थी, लेकिन अपने चहेते गायक को आखिरी बार देखने और कंधा देने के लिए लोग प्रकृति की मार को भूलकर छतरियां लिए नम आंखों से खड़े रहे। यह दृश्य भारतीय संगीत के इतिहास का सबसे भावुक कर देने वाला पल था, जिसने साफ कर दिया कि रफी साहब की आवाज हमेशा-कल्याण के लिए अमर हो चुकी है।