News India Live, Digital Desk: पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के बादलों ने अब भारतीय मछुआरों और देश की तटीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी जंग का सीधा असर उन हजारों भारतीय मछुआरों पर पड़ा है, जो रोजी-रोटी की तलाश में खाड़ी देशों के समंदर में उतरते थे। युद्ध के कारण ईरान के तटों पर भारतीय मछुआरों की नावें खड़ी की खड़ी रह गई हैं, जिससे न केवल उनकी जान पर बन आई है, बल्कि भारत के समुद्री निर्यात (Seafood Export) को भी तगड़ा झटका लगा है।
समंदर में सन्नाटा: ईरान के तटों पर लावारिस पड़ीं नावें
ईरान और आसपास के समुद्री इलाकों में तनाव इतना बढ़ गया है कि मछली पकड़ने का काम पूरी तरह ठप हो चुका है। रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध की स्थिति को देखते हुए ईरान ने अपने बंदरगाहों और समुद्री सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। इसके चलते भारतीय मछुआरों की सैकड़ों नावें तटों पर ही खड़ी कर दी गई हैं। इन नावों के मालिक और उन पर काम करने वाले कर्मचारी अब दाने-दाने को मोहताज हो रहे हैं। कई मछुआरों ने अपने परिवारों को संदेश भेजा है कि वे वहां फंसे हुए हैं और ईंधन व राशन की कमी के कारण वापस लौटने की स्थिति में भी नहीं हैं।
भारत की समुद्री इकोनॉमी पर गहरा असर
ईरान और खाड़ी देश भारत के लिए सीफूड निर्यात के बड़े केंद्र रहे हैं। इस युद्ध ने सप्लाई चेन को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया है। जानकारों का मानना है कि बंदरगाहों के बंद होने और जहाजों की आवाजाही रुकने से भारत के समुद्री व्यापार को करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। विशेष रूप से केरल, तमिलनाडु और गुजरात के तटीय इलाकों के वे परिवार जो खाड़ी देशों में काम करने वाले मछुआरों की कमाई पर निर्भर थे, अब गहरे आर्थिक संकट में हैं।
रेस्क्यू ऑपरेशन की बढ़ती मांग और सरकारी कोशिशें
फंसे हुए मछुआरों के परिजनों ने भारत सरकार से गुहार लगाई है कि उनके अपनों को जल्द से जल्द सुरक्षित वापस लाया जाए। हालांकि, भारत सरकार ने अब तक कई नागरिकों को वहां से निकाला है, लेकिन मछुआरों और उनके रोजगार के साधनों (नावों) को लेकर स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। विदेश मंत्रालय स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए है और अंतरराष्ट्रीय गलियारों के माध्यम से सुरक्षित रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा है।
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