Prabhat Vaibhav,Digital Desk : उत्तराखंड की सियासत में ‘सियासी चाणक्य’ माने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत (हरदा) एक बार फिर सुर्खियों में हैं। कांग्रेस के भीतर मचे घमासान और बागियों की घर वापसी को लेकर चल रही खींचतान के बीच रावत ने हरिद्वार जिले में अपनी सक्रियता अचानक तेज कर दी है। लक्सर से लेकर भगवानपुर और रुड़की से मंगलौर तक, हरदा लगातार जमीन पर उतरकर पुराने कार्यकर्ताओं की नब्ज टटोल रहे हैं।
अपनों की ‘घर वापसी’ पर नाराजगी और फिर मैदान में उतरे हरदा
पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस आलाकमान ने भाजपा से निष्कासित नेताओं और पुराने बागियों को दोबारा पार्टी की सदस्यता दिलाई है। सूत्रों की मानें तो हरीश रावत कुछ चेहरों की वापसी से खुश नहीं हैं और उन्होंने अपनी नाराजगी सोशल मीडिया के जरिए जाहिर भी की थी। इसी आंतरिक गुटबाजी के बीच अब रावत का हरिद्वार के हर ब्लॉक और गांव में पहुंचना, आलाकमान को अपनी जमीनी ताकत का अहसास कराने की कोशिश माना जा रहा है।
ईद मिलन से लेकर जन्मदिन तक, हर बहाने कार्यकर्ताओं से मेल-जोल
हरीश रावत इस समय हरिद्वार जिले के कोने-कोने का दौरा कर रहे हैं:
निजी कार्यक्रम: कहीं वह ‘ईद मिलन’ समारोह में शामिल हो रहे हैं, तो कहीं पुराने कार्यकर्ताओं के जन्मदिन पर उनके घर पहुंच रहे हैं।
भगवानपुर दौरा: हाल ही में उन्हें घाड़ विकास परिषद के पूर्व अध्यक्ष राव फरमूद के यहां समर्थकों के साथ देखा गया।
रणनीति: उनकी इस सक्रियता से वो पुराने कांग्रेसी जो हाशिए पर थे, एक बार फिर एकजुट होने लगे हैं।
हरिद्वार: रावत परिवार का अभेद्य किला
हरिद्वार जिला हमेशा से हरीश रावत की राजनीति का केंद्र रहा है।
सांसद व केंद्रीय मंत्री: वह यहां से सांसद और केंद्र में कद्दावर मंत्री रह चुके हैं।
बेटी की जीत: उनकी बेटी अनुपमा रावत ने हरिद्वार ग्रामीण सीट पर भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री स्वामी यतीश्वरानंद को हराकर अपनी राजनीतिक धमक दिखाई थी।
गहरी पैठ: जिले के ग्रामीण इलाकों और किसान राजनीति पर हरदा की पकड़ आज भी उतनी ही मजबूत मानी जाती है।
क्या बोले पूर्व सीएम?
जब उनकी अचानक बढ़ी सक्रियता पर सवाल पूछा गया, तो हरीश रावत ने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा:
“मैं कोई नया सक्रिय नहीं हुआ हूं, मैं तो हमेशा से ही जनता और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच रहता हूं। कार्यकर्ताओं से संवाद करना और उनके सुख-दुख में शामिल होना मेरी पुरानी आदत है।”
सियासी मायने: 2027 की तैयारी?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हरीश रावत की यह सक्रियता केवल गुटबाजी का जवाब नहीं है, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए अपना आधार मजबूत करने की एक सोची-समझी रणनीति है। पार्टी के भीतर अपनी उपेक्षा न होने देने के लिए हरदा ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ के साथ-साथ ‘पीपल्स कनेक्ट’ का सहारा ले रहे हैं।
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