News India Live, Digital Desk: अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच पर एक ऐसा चमत्कार हुआ है जिसने दुनिया भर के रणनीतिकारों को चौंका दिया है। कल तक अपनी बदहाल अर्थव्यवस्था के लिए दुनिया के सामने हाथ फैलाने वाला पाकिस्तान, आज अमेरिका और ईरान जैसे कट्टर दुश्मनों के बीच ‘शांति का दूत’ बनकर उभरा है। इस्लामाबाद में आज (10 अप्रैल 2026) से शुरू हो रही ऐतिहासिक शांति वार्ता ने पाकिस्तान को वैश्विक राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है।
ट्रंप और शरीफ के बीच ‘सीक्रेट’ बातचीत ने पलटी बाजी
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे रोचक बात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वह बयान है, जिसमें उन्होंने खुलेआम स्वीकार किया कि उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के अनुरोध पर ईरान पर होने वाले बड़े हमले को टाल दिया। ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा कि पाकिस्तान ने उनसे विनाशकारी सैन्य कार्रवाई रोकने की अपील की थी, जिसके बाद वे युद्धविराम (Ceasefire) के लिए राजी हुए।
क्यों चुना गया पाकिस्तान? ये हैं 3 बड़े कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की इस सफलता के पीछे तीन मुख्य रणनीतिक कारण रहे हैं:
ईरान के साथ साझा हित: पाकिस्तान और ईरान के बीच 900 किलोमीटर लंबी सीमा है। ईरान को भरोसा है कि पाकिस्तान उसकी बात को सही तरीके से वॉशिंगटन तक पहुंचा सकता है।
सैन्य कूटनीति: फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के अमेरिकी प्रशासन के साथ मजबूत सुरक्षा संबंधों ने पर्दे के पीछे अहम भूमिका निभाई।
तटस्थता का दांव: खाड़ी देशों (GCC) के बीच आपसी मतभेदों के कारण अमेरिका को एक ऐसे क्षेत्रीय खिलाड़ी की तलाश थी जो ईरान के करीब भी हो और पश्चिमी देशों का सहयोगी भी।
क्या स्थायी होगी यह शांति?
हालांकि इस्लामाबाद में आज से वार्ता शुरू हो रही है, लेकिन चुनौतियां कम नहीं हैं। दो हफ्ते का यह अस्थायी युद्धविराम तभी स्थायी शांति में बदल पाएगा जब ईरान ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को पूरी तरह खोलने और अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाने के अमेरिकी प्रस्ताव को मान लेगा। पाकिस्तान के लिए यह ‘अग्निपरीक्षा’ है; यदि यह वार्ता सफल रहती है, तो पाकिस्तान की वैश्विक साख में जबरदस्त इजाफा होगा।
शशि थरूर ने बताया ‘डिप्लोमैटिक फिग लीफ’
इस बीच, भारत के पूर्व राजनयिक और सांसद शशि थरूर ने पाकिस्तान की इस भूमिका पर तंज कसते हुए इसे ‘डिप्लोमैटिक फिग लीफ’ (कूटनीतिक मुखौटा) करार दिया है। उनका कहना है कि यह केवल वॉशिंगटन और तेहरान के लिए एक ऐसा रास्ता है जिससे वे बिना अपनी साख खोए पीछे हट सकें। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि इससे क्षेत्र में शांति आती है, तो यह स्वागत योग्य है।
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