
रामानंद सागर के कालजयी धारावाहिक ‘रामायण’ की अपार सफलता से पहले, दर्शकों के दिलों में ‘विक्रम और बेताल’ ने अपनी एक अलग ही जगह बनाई थी। 80 के दशक का यह शो न केवल अपनी कहानी, बल्कि बेताल के उस जादुई किरदार के लिए भी याद किया जाता है जो राजा विक्रम की पीठ पर बैठकर सवाल पूछता था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस शो में ‘बेताल’ का किरदार निभाने वाले सज्जन लाल पुरोहित का करियर एक गलत फैसले के कारण कैसे ढलान पर आ गया?
कैसे बने थे सज्जन लाल पुरोहित ‘बेताल’?
सज्जन लाल पुरोहित और रामानंद सागर परिवार के बीच काफी पुराने संबंध थे। प्रेम सागर द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, सागर परिवार और सज्जन का परिवार एक-दूसरे के काफी करीबी थे। जब रामानंद सागर ने ‘विक्रम और बेताल’ बनाने का निर्णय लिया, तो उन्हें ‘बेताल’ की भूमिका के लिए एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो पिशाच के रूप में भी दर्शकों को भा जाए। अपनी पुरानी दोस्ती के चलते, रामानंद सागर ने सज्जन को बेताल का रोल ऑफर किया और यह फैसला मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ।
फीस का विवाद: जब शो की हिट होते ही बदल गए तेवर
‘विक्रम और बेताल’ की लोकप्रियता आसमान छूने लगी थी। लोग बेताल के उस प्रसिद्ध संवाद “तू बोला, तो मैं चला जा रहा हूं, मैं तो चला…”के दीवाने हो गए थे। सफलता का स्वाद चखते ही सज्जन ने अपनी फीस बढ़ाने की मांग रख दी। ‘सागर वर्ल्ड’ की रिपोर्ट्स के अनुसार, जब उन्होंने प्रोड्यूसर्स के सामने बढ़ी हुई फीस का प्रस्ताव रखा, तो मेकर्स ने उसे मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद मतभेद इतने बढ़ गए कि सज्जन ने शो बीच में ही छोड़ दिया।
मेकर्स का ‘जुगाड़’: बिना बेताल के ही आगे बढ़ा शो
सज्जन को लगा था कि उनके बिना शो का आगे बढ़ना मुश्किल है, लेकिन रामानंद सागर ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक ऐसा तरीका निकाला जिसने सज्जन के करियर को गहरा झटका दिया:
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पुरानी फुटेज का इस्तेमाल: मेकर्स ने सज्जन के बिना नए सिरे से शूटिंग करने के बजाय, उनके पिछले एपिसोड्स की फुटेज का उपयोग किया।
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डबिंग का सहारा: उन्होंने एक वॉइस-ओवर आर्टिस्ट के जरिए बेताल की आवाज़ डब करवाई, ताकि दर्शकों को लगे कि बेताल अभी भी कहानी का हिस्सा है।
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नतीजा: शो रुकने के बजाय पहले की तरह ही सफल रहा और सज्जन को दोबारा बुलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।
इस घटना के बाद सज्जन का करियर मानो थम सा गया। जहां एक तरफ वे शो के जरिए स्टार बन सकते थे, वहीं फीस की जिद ने उनसे वह सुनहरा अवसर छीन लिया। यह किस्सा आज भी फिल्म जगत में इस बात की मिसाल दी जाती है कि सफलता के शीर्ष पर पहुंचकर भी विनम्रता और व्यावहारिक समझ कितनी ज़रूरी है।
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