
ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा नाजुक युद्धविराम अब पूरी तरह से टूटने की कगार पर खड़ा है। पिछले 24 घंटों में हुई सैन्य घटनाओं ने पूरे मध्य-पूर्व (Middle East) में हलचल मचा दी है।
कुवैत में अमेरिकी एयर बेस पर हमला
ईरानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कुवैत स्थित ‘अली अल सलेम एयर बेस’ को निशाना बनाते हुए बैलिस्टिक मिसाइल (फतेह-110) से हमला किया।
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एयर डिफेंस का एक्शन: कुवैत के एयर डिफेंस सिस्टम ने मिसाइल को हवा में ही इंटरसेप्ट कर लिया, लेकिन मलबे के गिरने से अमेरिकी सैनिकों के घायल होने की खबर है।
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जवाबी कार्रवाई: ईरान का कहना है कि यह हमला उनके दक्षिणी हिस्से, विशेषकर बंदर अब्बास पर हुए अमेरिकी हमलों का जवाब था।
अमेरिका को बड़ा सैन्य झटका: MQ-9 रीपर ड्रोन नष्ट
इस हमले में अमेरिका को न केवल मानवीय बल्कि सैन्य रूप से भी भारी नुकसान हुआ है।
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MQ-9 रीपर ड्रोन: अमेरिका के दो अत्यंत महत्वपूर्ण और उन्नत ‘MQ-9 रीपर’ स्ट्राइक ड्रोन क्षतिग्रस्त हुए हैं। इनमें से एक पूरी तरह नष्ट हो गया है।
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आर्थिक और सामरिक नुकसान: एक MQ-9 रीपर ड्रोन की अनुमानित कीमत लगभग 3 करोड़ डॉलर होती है। खुफिया निगरानी और सटीक हमलों में इनकी अहम भूमिका के कारण यह अमेरिका के लिए एक बड़ा सामरिक झटका है।
व्हाइट हाउस में ट्रंप की बैठक और ईरान डील की अनिश्चितता
इस तनावपूर्ण माहौल के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के साथ लगभग दो घंटे तक उच्चस्तरीय बैठक की।
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अंतिम फैसले का इंतजार: बैठक का मुख्य उद्देश्य युद्धविराम की अवधि को 60 दिनों तक बढ़ाना और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को दोबारा खोलने पर चर्चा करना था, लेकिन कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका।
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ट्रंप की शर्तें: प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, ट्रंप केवल तभी किसी समझौते को मंजूरी देंगे जब वह उनकी तय शर्तों को पूरा करे और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पूर्ण अंकुश लगाए।
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ईरान का रुख: दूसरी तरफ, ईरान ने भी साफ कर दिया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम जारी रहेगा और वह होर्मुज जलडमरूमध्य को टोल-फ्री करने के किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेगा।
स्थिति की गंभीरता
जहां एक ओर मीडिया रिपोर्टों में प्रारंभिक समझौते की चर्चा थी, वहीं सैन्य हमलों ने स्थिति को फिर से अनिश्चित बना दिया है। अमेरिका और ईरान, दोनों ही देश अभी तक अपने रुख पर अड़े हुए हैं। मध्य-पूर्व में बढ़ रही यह सैन्य सक्रियता वैश्विक शांति और तेल आपूर्ति के लिए चिंता का बड़ा कारण बनी हुई है।
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