
अमिताभ बच्चन के करियर और उनके जीवन में फिल्म ‘कुली’ (1983) का महत्व किसी ऐतिहासिक घटना से कम नहीं है। मनमोहन देसाई के निर्देशन में बनी यह फिल्म न केवल बॉक्स ऑफिस पर एक मील का पत्थर साबित हुई, बल्कि यह फिल्म उस वक्त के सबसे बड़े मेडिकल ड्रामे का भी हिस्सा बन गई। इस फिल्म से जुड़ी सबसे चर्चित बात इसका वह अंत है जिसे असल जिंदगी में मिली अमिताभ बच्चन की नई जिंदगी के बाद बदल दिया गया था।
मौत और एक इमोशनल गाना: जो फिल्म का हिस्सा नहीं बन सका
फिल्म की मूल पटकथा (Original Script) के अनुसार, अंत में अमरीश पुरी की गोली अमिताभ बच्चन के किरदार ‘इकबाल खान’ को छलनी कर देती है और उनकी मौत हो जाती है। इस दुखद दृश्य को और अधिक भावुक बनाने के लिए एक विशेष गाना तैयार किया गया था—फिल्म के प्रसिद्ध गाने ‘सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं’ का एक सैड वर्जन। यह गाना इतना मार्मिक था कि उसे सुनकर कोई भी अपनी भावनाएं नहीं रोक पाता। लेकिन शूटिंग के दौरान हुए हादसे ने पूरी कहानी ही बदल दी।
शूटिंग का वो मंजर: जब देश की धड़कनें रुक गई थीं
फिल्म ‘कुली’ की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन को गंभीर चोट लगी, जिससे उनके शरीर के अंदरूनी हिस्से में गंभीर रक्तस्राव (Internal Bleeding) हुआ। यह स्थिति जानलेवा साबित हो रही थी। उस समय पूरा भारत अस्पताल के बाहर अमिताभ की सलामती के लिए प्रार्थना कर रहा था। डॉक्टर, यज्ञ और दुआओं के बीच, अमिताभ मौत को मात देकर वापस लौटे।
डायरेक्टर मनमोहन देसाई का फैसला: मौत को दी मात
जब अमिताभ बच्चन पूरी तरह स्वस्थ होकर सेट पर लौटे, तो डायरेक्टर मनमोहन देसाई को लगा कि जिस अभिनेता ने मौत के मुंह से खुद वापसी की है, उसका किरदार स्क्रीन पर मरते हुए देखना फैंस के लिए बेहद दुखद होगा। उन्होंने फिल्म की पटकथा में बड़ा बदलाव किया।
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मौत का सीन हटाया: इकबाल खान की मौत वाला सीन फिल्म से हटा दिया गया।
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डॉक्टर का चमत्कार: फिल्म के अंत में अमिताभ के किरदार को मरते हुए दिखाया गया, लेकिन फिर एक ‘डॉक्टरी चमत्कार’ के जरिए उन्हें फिर से जीवित दिखाया गया।
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असली जिंदगी का अक्स: फिल्म के अंत में वह सीन जोड़ा गया जिसमें अमिताभ हॉस्पिटल की छत पर खड़े होकर लोगों का शुक्रिया अदा करते हैं, जो असल जिंदगी में उनके ठीक होकर घर लौटने के दृश्य जैसा ही था।
बॉक्स ऑफिस पर ‘धांसू’ साबित हुई फिल्म
मनमोहन देसाई का यह बदलाव न केवल दर्शकों के दिलों को छू गया, बल्कि ‘कुली’ को एक भावनात्मक कनेक्ट भी दिया। दर्शकों ने इसे केवल एक फिल्म की तरह नहीं, बल्कि एक सेलिब्रेशन की तरह देखा कि उनका ‘महानायक’ सुरक्षित है। फिल्म ‘कुली’ आज भी भारतीय सिनेमा की उन चुनिंदा फिल्मों में गिनी जाती है, जिसमें रील और रियल लाइफ के बीच की रेखा पूरी तरह मिट गई थी।
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