Parshuram Jayanti 2026: भगवान परशुराम के जन्मोत्सव पर जानें उनकी अनकही कथा महादेव से कैसे प्राप्त की थी शस्त्र विद्या और दिव्य फरसा

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News India Live, Digital Desk: हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान परशुराम की जयंती मनाई जाती है। भगवान परशुराम को विष्णु जी का छठा अवतार माना जाता है और वे उन सात चिरंजीवियों में शामिल हैं, जो आज भी पृथ्वी पर जीवित हैं। वर्ष 2026 में परशुराम जयंती का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। आइए जानते हैं उस प्रतापी ब्राह्मण की कथा, जिन्होंने अपनी तपस्या से महादेव को प्रसन्न कर शस्त्र और शास्त्र का अद्भुत समन्वय स्थापित किया।

कौन हैं भगवान परशुराम?

भगवान परशुराम का जन्म भृगु कुल के महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ था। उनका मूल नाम ‘राम’ था, लेकिन उनके पराक्रम और हाथ में सदैव रहने वाले ‘परशु’ (फरसा) के कारण वे परशुराम कहलाए। वे न केवल एक प्रकांड विद्वान थे, बल्कि युद्ध कौशल में भी अद्वितीय थे। उन्हें न्याय का देवता माना जाता है, जिन्होंने अधर्मी हैहय वंशी राजाओं का दमन कर पृथ्वी पर धर्म की स्थापना की थी।

महादेव से प्राप्त की थी ‘शस्त्र विद्या’ और दिव्य ‘परशु’

परशुराम जी की सबसे बड़ी विशेषता उनका ‘परशु’ यानी फरसा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें न केवल अपना शिष्य बनाया, बल्कि उन्हें मार्शल आर्ट्स और अजेय शस्त्र विद्या का ज्ञान भी दिया। इसी तपस्या के फलस्वरूप शिव जी ने उन्हें अपना दिव्य ‘परशु’ प्रदान किया था, जिससे वे अजेय बन गए।

परशुराम जयंती का महत्व और पूजन विधि

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, परशुराम जयंती के दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य करने का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ परशुराम जी की पूजा की जाती है। चूंकि वे सात चिरंजीवियों में से एक हैं, इसलिए उनकी पूजा से लंबी आयु और साहस का आशीर्वाद मिलता है। अक्षय तृतीया के दिन ही उनकी जयंती होने के कारण इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य अक्षय फल प्रदान करता है।

शस्त्र और शास्त्र के समन्वय के प्रतीक

भगवान परशुराम का व्यक्तित्व हमें सिखाता है कि एक व्यक्ति को शास्त्र (ज्ञान) के साथ-साथ शस्त्र (सुरक्षा और न्याय) में भी निपुण होना चाहिए। उन्होंने कलयुग के आगमन तक महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने का संकल्प लिया था। मान्यता है कि वे कल्कि अवतार के गुरु के रूप में प्रकट होंगे और उन्हें युद्ध कौशल की शिक्षा देंगे। उनकी जयंती पर देशभर के मंदिरों में विशेष हवन और शोभायात्राओं का आयोजन किया जाता है।

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