उत्तराखंड में घर बनाना हुआ महंगा,धामी सरकार ने बढ़ाई खनन की रॉयल्टी

देहरादून: उत्तराखंड में अपना आशियाना बनाने का सपना देख रहे लोगों की जेब पर अब अतिरिक्त बोझ पड़ने वाला है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार ने प्रदेश में खनन सामग्री की रॉयल्टी दरों में भारी बढ़ोतरी करने का निर्णय लिया है। कैबिनेट के इस फैसले के बाद रेत, बजरी, बोल्डर और पत्थरों के दामों में जबरदस्त इजाफा होने के आसार हैं। सरकार के इस कदम से न केवल निजी घर बनाना महंगा होगा, बल्कि सरकारी और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की लागत भी बढ़ जाएगी।

रॉयल्टी दरों में कितनी हुई बढ़ोतरी?

उत्तराखंड वन विकास निगम और खनन विभाग की ओर से जारी नए निर्देशों के अनुसार, विभिन्न खनन सामग्रियों पर रॉयल्टी की दरों को संशोधित किया गया है। नई दरों के तहत:

  • रेत (Sand): रेत की प्रति घन मीटर रॉयल्टी में करीब 20 से 30 प्रतिशत की वृद्धि की गई है।

  • बजरी और बोल्डर (Boulders): निर्माण में इस्तेमाल होने वाले पत्थरों और बजरी की दरों में भी भारी बढ़ोतरी हुई है।

  • अतिरिक्त उपकर (Extra Cess): रॉयल्टी के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और बुनियादी ढांचे के विकास के नाम पर कुछ अतिरिक्त टैक्स भी जोड़े गए हैं।

क्यों लिया गया रॉयल्टी बढ़ाने का फैसला?

सरकार का तर्क है कि प्रदेश के राजस्व (Revenue) को बढ़ाने और अवैध खनन पर लगाम लगाने के लिए यह कदम उठाना जरूरी था। संशोधित दरों से प्राप्त आय का उपयोग पर्यावरण क्षतिपूर्ति और सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण के लिए किया जाएगा। हालांकि, विपक्ष का आरोप है कि सरकार अपनी वित्तीय विफलताओं को छिपाने के लिए आम जनता पर महंगाई का बोझ डाल रही है।

निर्माण लागत पर सीधा असर: मध्यम वर्ग की बढ़ी चिंता

निर्माण सामग्री के दाम बढ़ने से उत्तराखंड के रियल एस्टेट सेक्टर और मध्यम वर्गीय परिवारों में चिंता है। जानकारों का कहना है कि:

  1. ईंट और कंक्रीट: रेत और पत्थर महंगे होने से ईंटों और कंक्रीट के काम की लागत बढ़ जाएगी।

  2. ट्रांसपोर्टेशन चार्ज: रॉयल्टी के साथ-साथ ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव से ढुलाई भी महंगी हो गई है।

  3. ठेकेदारों की मुश्किल: जो ठेकेदार पुराने रेट पर काम ले चुके हैं, उनके लिए अब प्रोजेक्ट पूरा करना घाटे का सौदा साबित हो रहा है।

अवैध खनन बढ़ने की आशंका

स्थानीय लोगों और व्यापारियों का मानना है कि सरकारी दरों में इतनी अधिक बढ़ोतरी से बाजार में ‘ब्लैक मार्केटिंग’ और ‘अवैध खनन’ को बढ़ावा मिल सकता है। जब वैध सामग्री महंगी होगी, तो लोग सस्ते विकल्पों की तलाश में अवैध स्रोतों की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे पर्यावरण को और अधिक नुकसान होने का खतरा है।