शेयर बाजार में हाहाकार विदेशी निवेशकों ने निकाले 2 लाख करोड़ से ज्यादा

मार्केट डेस्क: भारतीय शेयर बाजार के लिए साल 2026 अब तक काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की अंधाधुंध बिकवाली ने बाजार के जानकारों और निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, साल 2026 के शुरुआती पांच महीनों में ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजार से 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक की भारी-भरकम राशि निकाल ली है। यह आंकड़ा पिछले पूरे साल (2025) की कुल निकासी (1.66 लाख करोड़) को भी पार कर गया है। बाजार में मचे इस उथल-पुथल के पीछे वैश्विक कारकों के साथ-साथ पड़ोसी देश चीन के बाजार ‘शंघाई कंपोजिट’ का भी गहरा कनेक्शन सामने आ रहा है।

बिकवाली का रिकॉर्ड: मार्च और अप्रैल में टूटा निवेशकों का भरोसा

NSDL के आंकड़ों के मुताबिक, फरवरी को छोड़कर इस साल के हर महीने विदेशी निवेशक ‘नेट सेलर्स’ रहे हैं। जनवरी में करीब 35,962 करोड़ की निकासी के बाद, मार्च में बिकवाली ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और अकेले एक महीने में 1.17 लाख करोड़ रुपये बाजार से बाहर चले गए। अप्रैल में भी 60,847 करोड़ की बिकवाली दर्ज की गई और मई के शुरुआती 10 दिनों में ही 14,231 करोड़ रुपये निकाले जा चुके हैं। जानकारों का कहना है कि ऊंचे वैल्यूएशन और वैश्विक अनिश्चितता के कारण विदेशी निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।

शंघाई कंपोजिट कनेक्शन: क्यों चीन की ओर मुड़ रहे हैं निवेशक?

भारतीय बाजार से पैसा निकलने की एक बड़ी वजह ‘सेल इंडिया, बाय चाइना’ की रणनीति मानी जा रही है। पिछले काफी समय से भारतीय बाजार के वैल्यूएशन काफी महंगे (Expensive) हो गए थे, जबकि इसके मुकाबले चीन का ‘शंघाई कंपोजिट’ इंडेक्स काफी सस्ते वैल्यूएशन पर उपलब्ध था। चीनी सरकार द्वारा अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए घोषित किए गए राहत पैकेजों के बाद निवेशकों का नजरिया चीन के प्रति बदला है। कम कीमत पर बेहतर रिटर्न की उम्मीद में विदेशी फंड अब भारतीय बाजार से मुनाफावसूली कर अपना पैसा शंघाई और हांगकांग जैसे बाजारों में लगा रहे हैं।

महंगाई, ब्याज दरें और कच्चे तेल का त्रिकोणीय हमला

ग्लोबल मार्केट में बढ़ती ब्याज दरों और अमेरिका में बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) के मजबूत होने से इमर्जिंग मार्केट्स (भारत जैसे देशों) की चमक फीकी पड़ी है। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है। भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई और व्यापार घाटा बढ़ने का डर रहता है। इन्हीं चिंताओं ने विदेशी निवेशकों को भारतीय शेयरों से दूरी बनाने पर मजबूर किया है।

घरेलू निवेशकों (DII) ने संभाला मोर्चा, पर कब तक?

राहत की बात यह है कि जहां विदेशी निवेशक बाजार से भाग रहे हैं, वहीं घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) और रिटेल निवेशकों ने मोर्चा संभाल रखा है। साल 2026 में अब तक घरेलू निवेशकों ने बाजार में 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश किया है, जिससे बाजार को गिरने से काफी हद तक सहारा मिला है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि अगर FPI की बिकवाली इसी रफ्तार से जारी रही, तो घरेलू निवेश के दम पर बाजार की बढ़त को लंबे समय तक टिकाए रखना मुश्किल हो सकता है।