अमेरिका से जंग की आहट के बीच डरा ईरान? बातचीत के लिए रखीं 5 कड़ी शर्तें

तेहरान/वाशिंगटन: मिडिल ईस्ट में गहराते बारूद के ढेर के बीच ईरान और अमेरिका के रिश्तों में तल्खी अपने चरम पर पहुंच गई है। एक तरफ जहां अमेरिकी युद्धपोत और घातक लड़ाकू विमान खाड़ी क्षेत्र की ओर कूच कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान ने अब बातचीत का नया पैंतरा फेंका है। सैन्य मोर्चे पर घिरते देख ईरान ने अमेरिका के सामने बातचीत के लिए 5 मुख्य शर्तें रख दी हैं। हालांकि, इन शर्तों के साथ ही ईरान ने जिस तरह का ‘इमोशनल कार्ड’ खेला है, उसने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वाकई ईरान अमेरिका की युद्ध तैयारियों से घबरा गया है।

वो 5 शर्तें जिनसे झुकने को तैयार नहीं तेहरान ईरान ने जो शर्तें रखी हैं, उनमें सबसे प्रमुख अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाना है। सूत्रों के मुताबिक, ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले 2015 की न्यूक्लियर डील (JCPOA) में बिना किसी बदलाव के वापस लौटे और ईरान के तेल निर्यात पर लगी पाबंदियों को खत्म करे। इसके अलावा, ईरान ने मांग की है कि उसकी क्षेत्रीय सीमाओं में अमेरिकी दखल बंद हो और फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों को तत्काल रिलीज किया जाए। इन शर्तों को लेकर ईरान का रुख बेहद सख्त नजर आ रहा है, लेकिन हकीकत में यह उसकी रक्षात्मक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

मैदान-ए-जंग में घेराबंदी और ईरान की घबराहट जानकारों का मानना है कि ईरान की इस ‘शर्तों वाली कूटनीति’ के पीछे असल वजह अमेरिका की भारी सैन्य तैनाती है। पेंटागन ने हाल ही में खाड़ी देशों में बी-52 बॉम्बर और विमान वाहक पोतों की संख्या बढ़ा दी है। ईरान को डर है कि यदि इस बार संघर्ष छिड़ा, तो उसकी अर्थव्यवस्था और परमाणु ठिकाने पूरी तरह तबाह हो सकते हैं। यही कारण है कि एक ओर तेहरान अपनी सैन्य ताकत का दिखावा कर रहा है, तो दूसरी ओर बातचीत का रास्ता खुला रखकर युद्ध टालने की कोशिश में जुटा है।

मजहब और जज्बात: ईरान का नया मास्टरस्ट्रोक जब शर्तों से बात बनती नहीं दिखी, तो ईरान ने दुनिया भर के मुस्लिम देशों की सहानुभूति बटोरने के लिए ‘इमोशनल कार्ड’ खेल दिया है। ईरानी नेतृत्व ने सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह संदेश देना शुरू कर दिया है कि अमेरिका एक संप्रभु इस्लामिक देश को दबाने की कोशिश कर रहा है। ईरान खुद को पीड़ित के तौर पर पेश कर रहा है ताकि खाड़ी देशों के आम नागरिक अमेरिका के खिलाफ खड़े हो सकें। यह चाल सीधे तौर पर क्षेत्रीय देशों के जनमानस को प्रभावित करने के लिए चली गई है, जिससे अमेरिका पर कूटनीतिक दबाव बनाया जा सके।

बढ़ता तनाव और अनिश्चित भविष्य अमेरिका ने फिलहाल ईरान की इन शर्तों पर कोई सकारात्मक रुख नहीं दिखाया है। व्हाइट हाउस का स्पष्ट कहना है कि ईरान को पहले अपनी ‘आतंकी गतिविधियों’ और परमाणु संवर्धन को रोकना होगा। ऐसे में दोनों महाशक्तियों के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। यदि कूटनीति विफल रहती है, तो आने वाले दिन पूरी दुनिया के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या जो बाइडन प्रशासन ईरान की शर्तों पर झुकता है या फिर खाड़ी की हवाओं में बारूद की गंध और तेज होगी।