Rupee vs Dollar: रिकॉर्ड निचले स्तर पर भारतीय रुपया, सोने-चांदी पर ड्यूटी बढ़ाने के बाद भी 95.74 के पार

वैश्विक बाजार में जारी हलचल और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारतीय रुपये की सेहत लगातार बिगड़ती जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा सोने और चांदी पर सीमा शुल्क (Custom Duty) को 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी करने के बावजूद घरेलू मुद्रा में गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही है। बुधवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.1 प्रतिशत और टूटकर 95.7450 के नए ऐतिहासिक निचले स्तर (All-time Low) पर जा पहुंचा।

रुपये में गिरावट का सिलसिला जारी

विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की शुरुआत मामूली बढ़त के साथ 95.52 प्रति डॉलर पर हुई थी, लेकिन कारोबार के दूसरे सत्र में यह बढ़त टिक नहीं सकी। मंगलवार को भी रुपया 40 पैसे की बड़ी गिरावट के साथ 95.68 पर बंद हुआ था। साल 2026 की शुरुआत से अब तक भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 6.5% से अधिक कमजोर हो चुका है। वर्तमान में यह एशियाई देशों की मुद्राओं में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गई है।

आयात शुल्क और व्यापार घाटे की चुनौती

सरकार ने हाल ही में आयात लागत को कम करने और व्यापार घाटे (Trade Deficit) को नियंत्रित करने के लिए कीमती धातुओं पर आयात शुल्क में भारी इजाफा किया है। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल ने भारत के लिए विदेशी मुद्रा का संकट बढ़ा दिया है। ब्रेंट क्रूड में पिछले कुछ महीनों में करीब 50% की तेजी दर्ज की गई है, जिसका सीधा असर भारत के मैक्रोइकॉनमिक आउटलुक पर पड़ रहा है।

निवेशकों का रुख और विशेषज्ञों की राय

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय विकास दर (Growth Forecast) के अनुमानों में कटौती और महंगाई की आशंकाओं ने रुपये पर दबाव दोगुना कर दिया है। मंगलवार को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने बाजार से 1,959.39 करोड़ रुपये निकाल लिए, जिससे गिरावट और गहरी हो गई। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जब तक कच्चे तेल की कीमतें कम नहीं होतीं या विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) में सुधार नहीं होता, तब तक रुपये में स्थिरता आना मुश्किल है।

आरबीआई की भूमिका और डॉलर इंडेक्स

बाजार जानकारों का कहना है कि डॉलर इंडेक्स 98.30 के स्तर पर मजबूती से बना हुआ है। यदि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) समय-समय पर हस्तक्षेप कर डॉलर की आपूर्ति नहीं बढ़ाता, तो रुपये में गिरावट और भी भयावह हो सकती थी। फिलहाल बाजार की नजरें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों की वापसी पर टिकी हैं।