
अमेरिकी राजनीति और वैश्विक कूटनीति में इन दिनों एक बेहद दिलचस्प और हैरान करने वाला घटनाक्रम चल रहा है। साल 2015 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के साथ परमाणु समझौता (JCPOA) किया था, तब डोनाल्ड ट्रंप ने उसकी सबसे तीखी आलोचना की थी। ट्रंप ने इसे ‘अमेरिका के इतिहास की सबसे खराब डील’ करार दिया था और 2018 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान वे इस समझौते से बाहर निकल गए थे। उन्होंने इसे अपनी विदेश नीति की सबसे बड़ी कामयाबी के रूप में प्रचारित किया था।
लेकिन साल 2026 में हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। हाल ही में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच हुए भीषण सैन्य तनाव और संघर्ष के बाद, अब ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ जिस नए शांति समझौते की कोशिशों में जुटा है, उसका पूरा ढांचा उसी ओबामा मॉडल की याद दिलाता है जिसे ट्रंप ने कभी नाकाम बताया था। अमेरिकी गलियारों में अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या ट्रंप सचमुच कोई नई और मजबूत डील बना रहे हैं या फिर पुराने समझौते को ही एक नए पैकेट में लपेटकर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।
क्या है पूरा मामला और क्यों फंसे ट्रंप?
हालिया रिपोर्टों के अनुसार, वाशिंगटन और तेहरान के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत के कई बिंदु सीधे तौर पर 2015 के जेसीपीओए (JCPOA) समझौते से मेल खाते हैं। दरअसल, हाल के युद्ध के बाद दोनों देश एक अस्थायी युद्धविराम पर सहमत हुए थे, जिसे अब 60 दिनों के लिए और बढ़ाने पर चर्चा चल रही है।
ट्रंप प्रशासन चाहता है कि इस नए समझौते के तहत ईरान अगले 20 वर्षों तक यूरेनियम का संवर्धन (Uranium Enrichment) पूरी तरह रोक दे और भविष्य में कभी भी परमाणु बम न बनाने की लिखित गारंटी दे। हालांकि, तेहरान इस मांग को लगातार खारिज कर रहा है। ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करने की है कि उनकी यह नई कोशिश ओबामा की डील से किस तरह बेहतर है, क्योंकि दोनों का मूल उद्देश्य एक ही है—ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना।
ओबामा की 2015 की डील बनाम ट्रंप का 2026 का नया प्रस्ताव
दोनों समझौतों के मुख्य बिंदुओं और शर्तों की सीधी तुलना नीचे दी गई तालिका से आसानी से समझी जा सकती है:
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों बन गया है सबसे बड़ा मुद्दा?
लंदन मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ सरे के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान वार्ता का पूरा ताना-बाना ओबामा युग की याद दिलाता है। दोनों समझौतों में एकमात्र बड़ा फर्क होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए क्यों जरूरी है यह रास्ता?
दुनिया के कुल तेल और ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। हालिया युद्ध के दौरान ईरान ने इस क्षेत्र पर अपना कड़ा सैन्य नियंत्रण स्थापित कर लिया था, जिससे दुनिया भर में ईंधन की कीमतें बढ़ने और महंगाई का खतरा पैदा हो गया था। ट्रंप जहां इस रास्ते को बिना किसी शुल्क के तुरंत पूरी दुनिया के लिए खुलवाना चाहते हैं, वहीं ईरान इस जलमार्ग के प्रबंधन में अपनी संप्रभुता और आर्थिक अधिकारों पर अड़ा हुआ है।
अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी के भीतर घिरे ट्रंप
इस नए समझौते को लेकर डोनाल्ड ट्रंप को सिर्फ विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी से ही नहीं, बल्कि अपनी खुद की रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी सीनेटर टेड क्रूज जैसे कट्टरपंथी नेताओं का साफ कहना है कि अगर नई डील के तहत भी ईरान को प्रतिबंधों से राहत मिलती है, उसके जब्त अरबों डॉलर उसे वापस दिए जाते हैं और वह होर्मुज जलमार्ग पर अपना प्रभाव बनाए रखता है, तो यह अमेरिका के लिए एक ‘विनाशकारी गलती’ होगी। यही वजह है कि ट्रंप पर एक ऐसा समझौता पेश करने का भारी राजनीतिक दबाव है, जो दिखने में ओबामा की डील से कहीं ज्यादा सख्त और आक्रामक लगे।
अब्राहम एकॉर्ड्स का विस्तार और क्षेत्रीय देशों का रुख
अपनी साख बचाने और इस डील को एक नया रंग देने के लिए ट्रंप ने इस वार्ता को ‘अब्राहम एकॉर्ड्स’ (Abraham Accords) के विस्तार से जोड़ने की कोशिश की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा कि उन्होंने सऊदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन, मिस्र, जॉर्डन, तुर्किये और पाकिस्तान जैसे देशों के नेताओं से इस शांति ढांचे में शामिल होने की अपील की है।
हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि मध्य-पूर्व और एशियाई देशों से ट्रंप के इस प्रस्ताव को कुछ खास समर्थन नहीं मिल रहा है। खबरों के मुताबिक, पाकिस्तान जैसे देशों ने इस विचार को सीधे तौर पर खारिज कर दिया है। ऐसे में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में ट्रंप युद्ध को टालने और अपनी राजनीतिक गरिमा को बचाने के बीच कैसे संतुलन साधते हैं।
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