
बिहार की राजनीति में रणनीतिकारों और नेताओं के दांव-पेंच हमेशा से चर्चा का विषय रहे हैं। राज्य में इन दिनों चल रहे विधान परिषद (MLC) चुनावों के बीच एक बार फिर से सियासत का पारा अपने चरम पर पहुंच गया है। जन सुराज के सूत्रधार और राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर (PK) ने इस चुनाव में एक ऐसा दांव चला है जिसने पुराने राजनीतिक दिग्गजों को भी चौंका दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर ने आज से करीब 21 साल पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा दिए गए एक मशहूर बयान और राजनीतिक फॉर्मूले को वर्तमान चुनाव में हूबहू उतार दिया है। इस अनोखी रणनीति के तहत मैदान में उतारे गए मजबूत प्रत्याशियों ने पारंपरिक दलों की नींद उड़ा दी है और मुकाबले को बेहद रोमांचक बना दिया है।
बात साल 2005 के आसपास की है जब बिहार की राजनीतिक जमीन तेजी से बदल रही थी और सुशासन बाबू के नाम से मशहूर नीतीश कुमार राज्य की सत्ता संभालने की पुरजोर तैयारी कर रहे थे। उस दौर में चुनावी टिकट बंटवारे और उम्मीदवारों के चयन को लेकर जब यह सवाल उठा कि छोटी या कमजोर पार्टियों और समीकरणों के सामने पार्टी किसे उतारेगी, तब नीतीश कुमार ने एक बेहद चर्चित और तार्किक बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि ‘हम बाघ के सामने बकरी नहीं लड़ाएंगे’, जिसका सीधा और स्पष्ट मतलब यह था कि किसी भी मजबूत और धुरंधर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी का मुकाबला करने के लिए कमजोर या हल्के उम्मीदवार को मैदान में उतारकर खानापूर्ति नहीं की जाएगी, बल्कि उसके मुकाबले उससे भी अधिक दमदार, सक्षम और जनाधार वाला चेहरा ही उतारा जाएगा ताकि सीधी और कांटे की टक्कर हो सके।
प्रशांत किशोर ने अपनी पार्टी जन सुराज के जरिए बिहार विधान परिषद के इस चुनाव में इसी पुराने और अचूक फॉर्मूले को आधुनिक कलेवर में आजमाया है। हाल ही में संपन्न हुए उपचुनावों और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को साधते हुए पीके ने सभी सीटों पर बेहद सोच-समझकर मजबूत उम्मीदवारों का चयन किया है। टिकट बंटवारे में सामाजिक न्याय और सोशल इंजीनियरिंग का पूरा ध्यान रखते हुए विभिन्न जातियों और समुदायों के प्रभावशाली चेहरों को टिकट दिया गया है। जानकारों का कहना है कि जन सुराज ने किसी भी सीट पर कमजोर खिलाड़ी उतारने के बजाय सीधे मुख्य दलों (जैसे एनडीए और महागठबंधन) के स्थापित और मजबूत क्षत्रपों के सामने अपने तगड़े प्रत्याशियों को खड़ा कर दिया है, जिससे चुनावी मैदान में त्रिकोणीय या आमने-सामने की कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है।
प्रशांत किशोर की इस आक्रामक और नपे-तुले फॉर्मूले वाली रणनीति का असर अब मैदानी स्तर पर साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। पहले जिन सीटों को पारंपरिक दल बहुत ही आसान या अपनी सेफ सीट मानकर चल रहे थे, वहां अब उन्हें कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। यही वजह है कि सत्ताधारी दल और विपक्ष दोनों के ही बड़े-बड़े मंत्रियों, सांसदों और विधायकों को इन चुनावों में अपनी पूरी ताकत झोंकनी पड़ रही है। घर-घर जनसंपर्क और नुक्कड़ सभाओं के जरिए जन सुराज के उम्मीदवार सीधे मतदाताओं के बीच अपनी पैفठ बना रहे हैं। इस स्थिति ने पारंपरिक राजनीतिक दलों की पेशानी पर बल ला दिया है क्योंकि उन्हें अब यह अहसास हो गया है कि इस बार मैदान में कमजोर प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि पूरी तैयारी के साथ उतरी नई ताकत है।
इस पूरी चुनावी प्रक्रिया में एक और खास बात यह देखने को मिल रही है कि समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़े प्रतिष्ठित और पेशेवर लोग भी अब राजनीति की इस नई धारा से जुड़ रहे हैं। बांकीपुर और अन्य जगहों पर मिले अनुभवों के बाद जन सुराज का सांगठनिक ढांचा और अधिक मजबूत होता नजर आ रहा है। पार्टी ने जिस तरह से जातीय समीकरणों को संतुलित करते हुए हर क्षेत्र में दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है, उससे यह स्पष्ट हो गया है कि प्रशांत किशोर सिर्फ कागजी दावे नहीं कर रहे, बल्कि जमीन पर बहुत ही सोची-समझी चाल चल रहे हैं। ‘बाघ के सामने मजबूत प्रतिद्वंद्वी’ उतारने की यह नीति आने वाले समय में बिहार की राजनीति के बड़े समीकरणों को किस तरह प्रभावित करेगी, इस पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं।
बिहार विधान परिषद के इन चुनावों के नतीजे चाहे जो भी हों, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार के पुराने और आजमाए हुए फॉर्मूले को नए सिरे से जीवंत करके मुख्यधारा की राजनीति में खलबली जरूर मचा दी है। जनता के बीच जाकर पारंपरिक दलों की कमियों को उजागर करना और मजबूत विकल्पों के साथ जनता के सामने खड़ा होना, इस बात का संकेत देता है कि आने वाले दिनों में बिहार की राजनीतिक लड़ाई अब उतनी आसान नहीं रहने वाली जितनी पहले हुआ करती थी। फिलहाल सभी की नजरें मतदान और आने वाले परिणामों पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि क्या यह नया प्रयोग वाकई में पारंपरिक क्षत्रपों के किले को ढहाने में कामयाब हो पाता है या नहीं।
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