ईरान से डील के बीच ‘भारत के दोस्त’ पर क्यों भड़का अमेरिका? तटस्थ बनने पर हड़काया

वैश्विक कूटनीति के मंच से इस वक्त एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। भारत और ईरान के बीच हाल ही में हुए चाबहार बंदरगाह समझौते ने दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका की नींद उड़ा दी है। ईरान के साथ बढ़ते व्यापारिक और रणनीतिक रिश्तों को लेकर अमेरिका अब इस पूरे घटनाक्रम में ‘भारत के एक बेहद करीबी दोस्त’ देश पर बुरी तरह भड़क गया है। वाशिंगटन ने इस देश के न्यूट्रल यानी तटस्थ रुख अपनाने पर सख्त आपत्ति जताई है और दोटूक लहजे में हड़काते हुए कहा है कि ‘तेहरान का साथ छोड़ो और हमारे पाले में आओ।’ इस चेतावनी के बाद अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल तेज हो गई है।

अमेरिका की नाराजगी की असली वजह

दरअसल, अमेरिका पिछले काफी समय से ईरान पर कड़े आर्थिक और रणनीतिक प्रतिबंध लगाकर उसे वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिशों में जुटा है। ऐसे में भारत का एक मजबूत सहयोगी देश जब ईरान के साथ अपने रिश्तों को सामान्य बनाए रखने और इस पूरी स्थिति में न्यूट्रल रहने की कोशिश कर रहा है, तो अमेरिका का पारा चढ़ गया। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इस संवेदनशील मोड़ पर किसी भी प्रमुख देश का तटस्थ रहना ईरान को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूती देना है, जिसे अमेरिका बर्दाश्त करने के मूड में बिल्कुल नहीं है।

वाशिंगटन की सीधी और सख्त चेतावनी

अमेरिकी अधिकारियों की तरफ से इस सहयोगी देश को जो संदेश भेजा गया है, वह बेहद आक्रामक है। राजनयिक सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका ने डिप्लोमैटिक चैनलों के जरिए साफ कह दिया है कि मौजूदा वैश्विक हालातों में बीच का रास्ता चुनने का विकल्प अब खत्म हो चुका है। अमेरिका ने सीधे शब्दों में अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि ‘तेहरान छोड़ो, हमें चुनो।’ वाशिंगटन इस बात पर अड़ा है कि उसके दोस्तों को ईरान के मामले में पूरी तरह से अमेरिकी नीतियों का समर्थन करना होगा और तेहरान के साथ हर तरह के रणनीतिक गठजोड़ से दूरी बनानी होगी।

भारत और उसके सहयोगियों पर बढ़ता दबाव

इस पूरे विवाद का सीधा असर भारत पर भी पड़ सकता है, क्योंकि जिस देश को अमेरिका धमका रहा है, वह भारत का बेहद भरोसेमंद और पुराना रणनीतिक साझेदार है। भारत पहले ही चाबहार पोर्ट के जरिए मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाने के लिए ईरान के साथ ऐतिहासिक समझौता कर चुका है। अब अमेरिका द्वारा भारत के दोस्तों पर बनाए जा रहे इस दबाव को एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, ताकि क्षेत्र में ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘भारत का यह दोस्त’ अमेरिकी घुड़की के सामने झुकता है या अपनी संप्रभुता को सर्वोपरि रखता है।