
पश्चिम बंगाल में बड़ा राजनीतिक बदलाव होने के बाद राज्य सरकार ने एक बेहद अहम कानूनी फैसला लिया है। सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) सूची से 77 समुदायों का दर्जा रद्द करने वाले कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी मुख्य अपील को वापस ले लिया है। सोमवार को देश की शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया कि राज्य कैबिनेट ने इस अपील को वापस लेने की मंजूरी दी है। इसके तुरंत बाद राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने भी अपनी अलग से दाखिल याचिका वापस ले ली, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
क्यों बदला राज्य सरकार का रुख?
यह पूरा विवाद कलकत्ता हाई कोर्ट के 22 मई 2024 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें कोर्ट ने राज्य की ओबीसी सूची में शामिल 77 समुदायों के आरक्षण दर्जे को निरस्त कर दिया था। तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार ने इस फैसले को देश की संप्रभु अदालत में चुनौती दी थी। अब राज्य में सत्ता परिवर्तन होने के बाद नई कैबिनेट ने इस नीति पर अपना रुख पूरी तरह बदल दिया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की विशेष पीठ ने राज्य सरकार और पिछड़ा वर्ग आयोग दोनों को अपनी याचिकाएं वापस लेने की अनुमति दे दी।
कलकत्ता हाई कोर्ट ने क्यों रद्द किया था 77 समुदायों का आरक्षण?
कलकत्ता हाई कोर्ट ने साल 2024 में दिए अपने फैसले में अप्रैल 2010 से सितंबर 2010 के बीच ओबीसी सूची में जोड़े गए 77 समुदायों के आरक्षण को अवैध घोषित किया था, जिनमें 75 मुस्लिम समुदाय शामिल थे। इसके अलावा, कोर्ट ने पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग अधिनियम, 2012 के तहत ओबीसी श्रेणी में शामिल किए गए 37 अन्य वर्गों के आरक्षण को भी पूरी तरह से निरस्त कर दिया था। अदालत का सख्त रुख था कि इन समुदायों को ओबीसी सूची में जगह देने के लिए केवल ‘धर्म’ को मुख्य आधार बनाया गया था, जो कि भारतीय संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ और पूरी तरह से असंवैधानिक है।
प्रभावित पक्षों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने खुला रखा रास्ता
भले ही पश्चिम बंगाल सरकार ने इस मामले से अपने हाथ खींच लिए हों, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उसका यह आदेश अन्य प्रभावित पक्षों का रास्ता नहीं रोकेगा। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने कुछ प्रभावित नागरिकों और समूहों की ओर से अपनी अलग याचिकाओं को आगे बढ़ाने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि यदि कोई अन्य प्रभावित पक्ष हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई जारी रखना चाहता है, तो वह स्वतंत्र है। आपको बता दें कि इससे पहले 6 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी और तब कुल 10 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई चल रही थी।
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