विजय बनाम येदियुरप्पा: तमिलनाडु राजभवन के ‘स्पीड ब्रेकर’ ने छेड़ी राज्यपाल की शक्तियों पर बहस

चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी पर्दे के ‘थलापति’ विजय के मुख्यमंत्री बनने के सफर में राजभवन एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। 2026 के विधानसभा चुनाव में 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) के नेता विजय जब कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश करने पहुंचे, तो राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने उन्हें शपथ दिलाने से इनकार कर दिया। राजभवन की इस सख्ती ने 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव की यादें ताजा कर दी हैं, जहाँ राज्यपाल का रुख इसके बिल्कुल विपरीत था।

2018 कर्नाटक: येदियुरप्पा को मिली थी ‘छूट’

मई 2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। भाजपा 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी, जबकि कांग्रेस (80) और जेडीएस (37) का गठबंधन बहुमत के आंकड़े (112) को पार कर चुका था।

  • राजभवन का फैसला: तत्कालीन राज्यपाल वजुभाई वाला ने गठबंधन के दावे को दरकिनार करते हुए सबसे बड़ी पार्टी के नेता बी.एस. येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी।

  • तर्क: उस समय राज्यपाल ने विधायकों के समर्थन पत्र की शर्त पहले नहीं रखी, बल्कि सदन में बहुमत साबित करने के लिए समय दिया। हालांकि, यह सरकार केवल 3 दिन ही चल सकी।

तमिलनाडु 2026: विजय के लिए नियमों की ‘सख्ती’

तमिलनाडु में मौजूदा स्थिति में राज्यपाल अर्लेकर ने विजय के सामने कड़ी शर्त रख दी है। राज्यपाल का कहना है कि शपथ ग्रहण की प्रक्रिया तभी शुरू होगी जब विजय 118 विधायकों के समर्थन वाला हस्ताक्षर युक्त पत्र पेश करेंगे।

  • आंकड़ों का गणित: 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 118 सीटें अनिवार्य हैं। विजय की TVK के पास 108 सीटें हैं और कांग्रेस के 5 विधायकों के साथ यह आंकड़ा 113 तक पहुंचता है।

  • सवाल: राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि जब 2018 में येदियुरप्पा को बिना बहुमत पत्र के शपथ दिलाई गई, तो विजय के मामले में ‘फिजिकल गारंटी’ की मांग क्यों की जा रही है?

एस.आर. बोम्मई मामला और फ्लोर टेस्ट का सिद्धांत

भारतीय संवैधानिक इतिहास में एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) का फैसला मील का पत्थर माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट की 9 न्यायाधीशों की बेंच ने स्पष्ट किया था कि किसी भी सरकार के बहुमत का परीक्षण राजभवन के बंद कमरों में नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल (Floor Test) पर होना चाहिए। राज्यपाल का काम प्रक्रिया को सुगम बनाना है, न कि खुद ही ‘जज’ की भूमिका में आना। विजय के मामले में आलोचकों का कहना है कि राज्यपाल ‘फ्लोर टेस्ट’ से पहले ही ‘राजभवन टेस्ट’ ले रहे हैं।

राज्यपाल का विशेषाधिकार या राजनीतिक एजेंडा?

संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, लेकिन ‘राज्यपाल की संतुष्टि’ का पैमाना हमेशा से विवादित रहा है। विजय के समर्थक इसे जनादेश का अपमान बता रहे हैं, क्योंकि वे राज्य की सबसे बड़ी पार्टी के नेता हैं। वहीं, कांग्रेस का आरोप है कि राज्यपाल केंद्र के इशारे पर विपक्षी दलों की सरकार बनने में बाधा डाल रहे हैं।

क्या पार पाएंगे विजय?

विजय के लिए अब असली चुनौती उन 5-6 अतिरिक्त विधायकों का समर्थन जुटाना है जो बहुमत के आंकड़े तक पहुंचा सकें। यदि VCK जैसे अन्य छोटे दल TVK को समर्थन देते हैं, तो विजय राजभवन की इस बाधा को पार कर सकते हैं। फिलहाल, तमिलनाडु की यह राजनीतिक रस्साकशी न केवल कानूनी लड़ाई की ओर बढ़ती दिख रही है, बल्कि राज्यपाल पद की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।