कैशलेस बीमाधारकों के लिए बड़ी पहल,डिस्चार्ज में देरी पर सांसद प्रवीण खंडेलवाल सख्त

नई दिल्ली: चांदनी चौक से भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने स्वास्थ्य बीमा (Medical Insurance) और कैशलेस इलाज की व्यवस्था में व्याप्त खामियों को लेकर केंद्र सरकार और बीमा नियामक संस्था (IRDAI) के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा और IRDAI के चेयरमैन को पत्र लिखकर अस्पतालों से डिस्चार्ज के समय होने वाली ‘प्रशासनिक प्रताड़ना’ को समाप्त करने हेतु तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है।

फाइलों और मंजूरी के नाम पर मरीजों का ‘बंधक’ बनना अमानवीय

सांसद खंडेलवाल ने अपनी चिट्ठी में देशभर के लाखों मरीजों की पीड़ा को स्वर दिया है। उन्होंने कहा कि डॉक्टर द्वारा फिट घोषित किए जाने के बाद भी बीमा कंपनियों, टीपीए (थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर) और अस्पतालों के बीच फाइलों, ई-मेल और औपचारिक मंजूरी के चक्कर में मरीजों को घंटों या पूरा दिन अस्पताल में बिताने पर मजबूर किया जाता है।

“महंगे प्रीमियम और डिजिटल क्रांति के इस युग में मरीजों को कागजी औपचारिकताओं के नाम पर रोके रखना पूरी व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाता है।”

IRDAI से सख्त दिशा-निर्देशों की मांग

प्रवीण खंडेलवाल ने IRDAI को भेजे पत्र में मांग की है कि बीमा कंपनियों और टीपीए के लिए समयबद्ध नियम बनाए जाएं। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य बीमा का उद्देश्य राहत देना था, लेकिन अब यह मरीजों और उनके परिवारों के लिए भारी मानसिक, शारीरिक और आर्थिक पीड़ा का कारण बन गया है। अस्पताल में अतिरिक्त समय तक रुकने के कारण मरीजों पर बेड चार्ज और दवाओं का अतिरिक्त बोझ भी पड़ता है।

टीपीए, बीमा कंपनी और अस्पताल का ‘कुचक्र’

भाजपा सांसद ने वर्तमान व्यवस्था पर कड़े प्रहार करते हुए इसे एक ‘कुचक्र’ बताया। उनके अनुसार:

  • इलाज पहले से स्वीकृत होने के बावजूद अंतिम समय पर नए प्रश्न खड़े किए जाते हैं।

  • रविवार, छुट्टियों और देर रात को अधिकारी उपलब्ध नहीं होने के कारण डिस्चार्ज लटका दिया जाता है।

  • अस्पताल प्रक्रिया शुरू करने में देरी करते हैं और बीमा कंपनियां जवाबदेही से बचती हैं।

केंद्र सरकार को दिए गए प्रमुख सुझाव

सांसद खंडेलवाल ने केंद्र सरकार से एक सख्त और समयबद्ध नीति लागू करने का आग्रह किया है, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  1. 1-2 घंटे की समय सीमा: डिस्चार्ज दस्तावेज जमा होने के 1 से 2 घंटे के भीतर टीपीए स्वीकृति अनिवार्य हो।

  2. डीम्ड अप्रूवल (Deemed Approval): तय समय में जवाब न मिलने पर स्वीकृति को स्वतः मान्य मानकर मरीज को जाने दिया जाए।

  3. जवाबदेही तय हो: अनावश्यक देरी पर अस्पताल, टीपीए और बीमा कंपनियों पर भारी जुर्माना लगे।

  4. 24×7 क्लेम क्लीयरेंस: स्वीकृतियों के लिए 24 घंटे और सातों दिन अधिकारी उपलब्ध रहें।

  5. एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म: पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए एक सेंट्रलाइज्ड डिजिटल सिस्टम बनाया जाए