अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु का प्रतीक ‘वट सावित्री व्रत’ इस वर्ष 15 मई 2026 को मनाया जाएगा। हिंदू धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व है, जहाँ सुहागिन महिलाएं बरगद के पेड़ (वट वृक्ष) की पूजा कर अपने पति की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। यह व्रत न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह सती सावित्री के उस अटूट संकल्प की याद दिलाता है, जिसके आगे मृत्यु के देवता यमराज को भी नतमस्तक होना पड़ा था।
सावित्री और सत्यवान की अमर कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना था। नारद मुनि ने सावित्री को सचेत किया था कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के ठीक एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु निश्चित है। इसके बावजूद सावित्री अपने फैसले पर अडिग रहीं। जब सत्यवान की मृत्यु का दिन आया, तो वे लकड़ियां काटने जंगल गए और वहां सावित्री की गोद में ही उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
जब यमराज ने छीने सत्यवान के प्राण
जैसे ही यमराज सत्यवान के प्राण लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे, सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल दीं। यमराज ने उन्हें वापस जाने को कहा और इसे विधि का विधान बताया, लेकिन सावित्री ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता और पतिव्रत धर्म की शक्ति से यमराज को प्रभावित करना शुरू किया। सावित्री की तर्कशक्ति और निष्ठा को देख यमराज प्रसन्न हुए और उन्होंने सावित्री को तीन वरदान मांगने को कहा, लेकिन शर्त रखी कि वे पति के प्राण नहीं मांग सकतीं।
सावित्री का वो चतुर वरदान, जिससे यमराज भी चकरा गए
सावित्री ने पहले वरदान में अपने ससुर की आंखों की रोशनी और खोया हुआ राज्य मांगा। दूसरे वरदान में अपने पिता के लिए सौ पुत्र मांगे। तीसरे वरदान के रूप में सावित्री ने यमराज से स्वयं के लिए ‘सौ पुत्रों की माता’ बनने का वरदान मांग लिया। यमराज ने बिना सोचे-समझे ‘तथास्तु’ कह दिया। इसके बाद सावित्री ने विनम्रता से कहा कि एक पतिव्रता स्त्री के लिए पति के बिना संतान सुख कैसे संभव है? अपनी ही बात में फंस जाने के कारण यमराज को विवश होकर सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े।
वट वृक्ष के नीचे ही मिला था जीवनदान
मान्यता है कि जब सावित्री यमराज से संवाद कर रही थीं, तब सत्यवान का पार्थिव शरीर वट वृक्ष (बरगद) के नीचे ही रखा था। इसी वृक्ष की छाया में सत्यवान पुनः जीवित हुए, इसीलिए इस दिन वट वृक्ष की पूजा का विधान है। बरगद के पेड़ को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का साक्षात स्वरूप माना जाता है। महिलाएं इस दिन वट वृक्ष के चारों ओर सूत का धागा लपेटकर अपने पति की दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं।
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