
भारत के चुनावी इतिहास में कई बार बेहद छोटे और अनजाने दल अचानक देश की महा-राजनीति के केंद्र बिंदु बन जाते हैं। ऐसा ही एक अविश्वसनीय और चौंकाने वाला राजनीतिक घटनाक्रम इन दिनों नई दिल्ली के सत्ता गलियारों में देखने को मिल रहा है। साल 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव (Tripura Assembly Election) में पूरी राज्य मशीनरी लगाने के बावजूद महज 822 वोट हासिल करने वाली एक गुमनाम सी पार्टी ‘नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) रातों-रात राष्ट्रीय राजनीति की सबसे बड़ी ‘पावर प्लेयर’ बनकर उभरी है।
इस चमत्कार की मुख्य वजह यह है कि पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी सांसदों के एक बहुत बड़े गुट ने इस छोटे से दल में अपने गुट के पूर्ण विलय (Merger) का सनसनीखेज ऐलान कर दिया है। यदि लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) द्वारा इस कानूनी विलय को हरी झंडी मिल जाती है, तो शून्य से शुरू करने वाली एनसीपीआई सीधे 20 लोकसभा सांसदों वाली देश की एक कद्दावर पार्टी बन जाएगी और संसद के निचले सदन में चौथी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित हो जाएगी।
स्पीकर के पास पहुंचे बागी सांसद; अभिषेक बनर्जी ने लगाया अड़ंगा
राजनीतिक गलियारों में मचे इस सियासी घमासान की टाइमलाइन और कड़ियां काफी तेजी से बदल रही हैं:
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NDA को समर्थन और अलग बैठने की मांग: रविवार को टीएमसी के बागी सांसदों के एक बड़े प्रतिनिधिमंडल ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Om Birla) से उनके संसद आवास पर मुलाकात की। बागी गुट ने औपचारिक रूप से सदन में टीएमसी के मूल बेंच से अलग बैठने की व्यवस्था करने की मांग की। इसके साथ ही, उन्होंने केंद्र की एनडीए (NDA) सरकार को बिना शर्त बाहर से समर्थन देने का भी आधिकारिक ऐलान कर दिया है।
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TMC की जवाबी घेराबंदी: दूसरी तरफ, इस बगावत से आक्रोशित टीएमसी संसदीय दल के नेता और मुख्य रणनीतिकार अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) ने तुरंत एक्शन लेते हुए स्पीकर ओम बिरला को एक कड़ा कानूनी पत्र लिखा है। अभिषेक बनर्जी ने स्पीकर से अपील की है कि दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत इस बागी गुट को संसद के भीतर किसी भी प्रकार की अलग गुट या पार्टी के रूप में मान्यता न दी जाए और इनकी सदस्यता रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
आखिर क्या है NCPI और चुनाव आयोग में इसका क्या स्टेटस है?
राजनीति में अचानक सुर्खियों में आई NCPI की कुंडली बेहद दिलचस्प है, जिसे जानना जरूरी है:
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पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया एक रजिस्टर्ड अन-रिकॉग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टी (RUPP) की श्रेणी में आती है। इसका सीधा मतलब यह है कि यह दल चुनाव आयोग में नियमों के तहत पंजीकृत तो है, लेकिन चुनावों में इसका प्रदर्शन इतना बड़ा नहीं रहा कि इसे एक क्षेत्रीय (State) या राष्ट्रीय (National) पार्टी का आधिकारिक दर्जा मिल सके।
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स्थापना और मुख्यालय: इस पार्टी की स्थापना बहुत हाल ही में साल 2022 में हुई थी और इसका मुख्य प्रशासनिक मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा (Howrah) में स्थित है।
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नेतृत्व: इस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष शिडली कुंडू (Shidli Kundu) हैं, जो पेशे से कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court) में एक कड़क और वरिष्ठ अधिवक्ता (Lawyer) हैं। कानूनी समझ होने के कारण ही वे इस पूरे विलय को कोर्ट के नियमों के दायरे में रख रही हैं।
अचानक बढ़ा सियासी कद: 20 सांसदों के इस अप्रत्याशित विलय के दावे ने इस क्षेत्रीय दल को नेशनल मीडिया की हेडलाइंस में ला दिया है। यदि लोकसभा अध्यक्ष की संवैधानिक मुहर इस पर लग जाती है, तो यह पार्टी संसद में बीजेपी, कांग्रेस और सपा के बाद चौथी सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी। इसके साथ ही, यह केंद्र सरकार में बीजेपी (BJP) के बाद एनडीए (NDA) कुनबे की दूसरी सबसे बड़ी मुख्य सहयोगी पार्टी बनने की हैसियत में भी आ जाएगी।
बड़ा सवाल: बागी सांसदों ने बीजेपी में सीधे शामिल होने के बजाय NCPI को क्यों चुना?
हर किसी के मन में यही सवाल है कि जब इन बागी सांसदों को भाजपा नीत एनडीए सरकार को ही समर्थन देना था, तो वे सीधे भारतीय जनता पार्टी में क्यों शामिल नहीं हुए?
वरिष्ठ और जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक राशिद किदवई (Rasheed Kidwai) के अनुसार, बागी सांसदों का सीधे बीजेपी का दामन थामने के बजाय एक छोटे, गैर-मान्यता प्राप्त दल (NCPI) के साथ जाने का फैसला केवल एक कानूनी मजबूरी नहीं, बल्कि एक बेहद सोची-समझी और गहरी रणनीतिक चाल का हिस्सा है:
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दल-बदल कानून (10वीं अनुसूची) का तोड़: संविधान की 10वीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के अनुसार, किसी भी पार्टी के दो-तिहाई सांसदों को अपनी सदस्यता बचाने के लिए किसी अन्य दल में अपने पूरे गुट का ‘विलय’ करना पड़ता है। चूंकि बीजेपी एक विशाल राष्ट्रीय पार्टी है, इसलिए उसमें तकनीकी और सांगठनिक तौर पर तुरंत विलय करने में कई व्यावहारिक पेच आ सकते थे। एक छोटी और अपने ही गृह राज्य (बंगाल) के मुख्यालय वाली पार्टी में विलय करना कानूनी रूप से अधिक आसान और सुरक्षित है।
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बीजेपी के लिए भी राजनीतिक सुविधा: राजनीतिक पंडितों का मानना है कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के लिए भी फिलहाल इन बागी सांसदों को सीधे अपनी पार्टी का सदस्य बनाने के बजाय एक स्वतंत्र सहयोगी दल (Ally) के रूप में एनडीए के पाले में रखना ज्यादा सुविधाजनक है। इससे बीजेपी पर सीधे तौर पर ‘क्षेत्रीय पार्टियों को तोड़ने’ का सीधा राजनीतिक आरोप नहीं लगेगा और संसद के भीतर सरकार को एक मजबूत और स्थायी बहुमत का सुरक्षा कवच भी मिल जाएगा।
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