
भारत में जहां एक तरफ दक्षिण-पश्चिम मानसून तेजी से आगे बढ़ रहा है और किसान खरीफ फसलों की बुवाई में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र (UN) की संस्था खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने एक बेहद चिंताजनक और डराने वाली रिपोर्ट जारी की है। सोमवार को जारी अपनी आधिकारिक चेतावनी में एफएओ ने साफ किया है कि वैश्विक स्तर पर अल नीनो (El Nino) का एक नया और बेहद आक्रामक दौर शुरू हो चुका है।
यह मौसमी बदलाव भारत के समर मानसून (दक्षिण-पश्चिम मानसून) के पूरे गणित को बिगाड़ सकता है, जिससे देश में धान और मक्के जैसी मुख्य खरीफ फसलों के उत्पादन पर गहरा संकट मंडरा रहा है। यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने भारत में सामान्य से अधिक मजबूत मानसूनी बारिश की भविष्यवाणी की थी, लेकिन अल नीनो की इस नई दस्तक ने कृषि वैज्ञानिकों, सरकार और किसानों की चिंताओं की लकीरें गहरी कर दी हैं।
धान और मक्के की फसल पर सबसे बड़ा खतरा; कमजोर होंगी मानसूनी हवाएं
न्यूज एजेंसी पीटीआई (PTI) के मुताबिक, FAO ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर जारी रिपोर्ट में उपग्रह से प्राप्त डेटा के आधार पर स्पष्ट किया है कि अल नीनो का प्रभाव भारत के एक बड़े हिस्से में मानसूनी हवाओं की गति को धीमा और कमजोर कर सकता है। इसके चलते पूरी तरह से बारिश और सिंचाई पर निर्भर रहने वाली फसलों, विशेष रूप से धान (Paddy) और मक्के (Maize) को उनके सबसे महत्वपूर्ण ग्रोइंग सीजन (फसल के बढ़ने के समय) के दौरान भारी जल संकट का सामना करना पड़ेगा। एशिया के इस बेल्ट में सूखे का यह जोखिम केवल किसानों के खेतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका सीधा और नकारात्मक असर ग्लोबल कमोडिटी मार्केट्स (वैश्विक अनाज बाजार) पर भी देखने को मिलेगा।
भारत सहित दक्षिण-पूर्वी एशिया के इन 9 देशों में सूखे का ‘हाई रिस्क’
एफएओ ने पिछले 41 वर्षों के ऐतिहासिक सैटेलाइट डेटा और तस्वीरों का गहन विश्लेषण करने के बाद दुनिया के उन सबसे संवेदनशील इलाकों (Vulnerable Zones) की पहचान की है, जहां मजबूत अल नीनो के कारण सबसे गंभीर कृषि सूखा (Agricultural Drought) पड़ता है। इस वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी एशिया के निम्नलिखित देशों को ‘हाई रिस्क’ (उच्च जोखिम) श्रेणी में रखा गया है:
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भारत और पाकिस्तान (दक्षिण एशिया)
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म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम
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फलिीपींस, इंडोनेशिया और तिमोर-लेस्ते
इतिहास का डर: 2015-16 के अल नीनो ने मचाई थी तबाही
रिपोर्ट में पूर्व में आए अल नीनो के विनाशकारी आर्थिक और कृषि आंकड़ों का हवाला देते हुए सचेत किया गया है। साल 2015-16 में जब भारत ने एक बेहद मजबूत अल नीनो चक्र का सामना किया था, तब देश के मक्के के उत्पादन में 4 फीसदी और धान के उत्पादन में 1 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी।
उस भयावह दौर में पूरे दक्षिण-पूर्वी एशिया में लगभग 1.5 करोड़ टन (15 मिलियन टन) चावल का नुकसान हुआ था। फसल बर्बाद होने के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चावल की कीमतें आसमान पर पहुंच गई थीं और अनाज के आयात पर निर्भर दुनिया के तमाम गरीब देशों की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी।
पिछली बार से भी ज्यादा खतरनाक होगा यह चक्र: एफएओ के प्राकृतिक संसाधन अधिकारी जॉर्ज अल्वारी-बेल्ट्रान ने इस चक्र के खतरों को लेकर आगाह करते हुए कहा, “जब भी मानसून और बारिश में कमी आती है, तो उसकी सबसे पहली और सीधी मार कृषि व्यवस्था पर पड़ती है। एक किसान सबसे पहले अपनी खड़ी फसल खोता है, उसके बाद चारे की कमी से उसके मवेशी दम तोड़ते हैं और देखते ही देखते उसकी पूरी आजीविका खत्म हो जाती है। हमारा आकलन है कि साल 2026 का यह अल नीनो चक्र पिछले इतिहास के मुकाबले कहीं अधिक नुकसानदेह और आक्रामक साबित हो सकता है।”
किसानों पर दोहरी मार: एक तरफ सूखा, दूसरी तरफ महंगा ईंधन और फर्टिलाइजर
कृषि सूखे की इस वैश्विक आशंका के बीच भारतीय किसानों को लागत (Input Cost) के मोर्चे पर भी बड़ा झटका लग रहा है। FAO ने अपनी रिपोर्ट में नोट किया है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) में चल रहे भीषण भू-राजनीतिक तनाव और जहाजों की आवाजाही में रुकावट के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल, डीजल और उर्वरक (खाद) की निर्माण लागत लगातार बढ़ रही है। खरीफ फसलों की बुवाई के इस सबसे महत्वपूर्ण समय में ईंधन और फर्टिलाइजर्स का महंगा होना भारतीय किसानों की जेब पर भारी वित्तीय बोझ डाल रहा है।
अर्ली एक्शन (Early Action) से बच सकता है अरबों का नुकसान
संयुक्त राष्ट्र की इस संस्था का मानना है कि अगर सरकारें समय रहते वैज्ञानिक और निर्णायक कदम उठाएं, तो होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, दक्षिणी अफ्रीका में साल 2023-24 के अल नीनो से ठीक पहले सीजन की शुरुआत में ही 3.1 करोड़ डॉलर (करीब 31 मिलियन USD) का आपातकालीन फंड जारी किया गया था। इस त्वरित सहायता से 7 देशों के 20 लाख से अधिक प्रभावित लोगों को समय पर सूखे से लड़ने वाले उन्नत बीज, मवेशियों के लिए चारे की सहायता और ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ मुहैया कराई गई थी, जिसने तबाही के असर को बेहद कम कर दिया था।
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