
देशभर में प्रतिदिन करोड़ों नागरिक भारतीय रेलवे से यात्रा करते हैं। लखनऊ, दिल्ली, मुंबई, पटना या बेंगलुरु जैसे बड़े जंक्शन हों या देश का कोई छोटा स्टेशन, सफर शुरू करने से पहले हर यात्री के सामने सबसे पहला सवाल टिकट बुकिंग का आता है। डिजिटल इंडिया के दौर में जहां अधिकांश लोग अपने स्मार्टफोन से IRCTC ऐप के जरिए टिकट बुक कर लेते हैं, वहीं आज भी रेलवे आरक्षण केंद्रों की खिड़कियों पर लंबी कतारें देखने को मिलती हैं। कई यात्रियों को लगता है कि दोनों जगह से खरीदे गए टिकट एक जैसे ही होते हैं और उनके अधिकार भी समान हैं, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। ऑनलाइन ई-टिकट और पीआरएस काउंटर टिकट के बीच कई ऐसे तकनीकी व कानूनी नियम हैं, जिनकी अनदेखी करने पर यात्री को भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है या फिर बिना सफर किए ही अपनी जेब ढीली करनी पड़ सकती है।
दोनों माध्यमों के बीच सबसे बड़ा और गंभीर अंतर वेटिंग लिस्ट टिकट को लेकर है। यदि आपने रेलवे स्टेशन के पीआरएस काउंटर से कोई स्लीपर या एसी क्लास का वेटिंग टिकट खरीदा है और चार्ट बनने के बाद भी वह कन्फर्म नहीं होता है, तो भी वह टिकट वैध माना जाता है। काउंटर वेटिंग टिकट के साथ यात्री ट्रेन में सवार होकर सामान्य या स्लीपर कोच में टीटीई से संपर्क कर खाली सीट की गुहार लगा सकता है और उसे अनाधिकृत यात्री नहीं माना जाता है। इसके विपरीत, यदि आपने IRCTC पोर्टल या ऐप से ई-टिकट बुक किया है और चार्ट तैयार होने के बाद भी वह वेटिंग लिस्ट में ही रह जाता है, तो रेलवे का सिस्टम उस टिकट को स्वतः निरस्त कर देता है। ऐसे निरस्त ई-टिकट पर ट्रेन के आरक्षित डिब्बे में यात्रा करना रेलवे अधिनियम के तहत पूर्णतः गैरकानूनी माना जाता है। टीटीई यात्री को बिना टिकट घोषित कर भारी जुर्माना वसूल सकता है और अगले स्टेशन पर उतारने का अधिकार भी रखता है।
किराए के स्तर पर भी ऑनलाइन और ऑफलाइन टिकट में साफ अंतर दिखता है। जब कोई यात्री रेलवे रिजर्वेशन काउंटर पर जाकर नकद, यूपीआई या कार्ड से टिकट खरीदता है, तो उसे केवल ट्रेन का बेस फेयर, आरक्षण शुल्क और सुपरफास्ट सरचार्ज ही देना पड़ता है। वहां किसी भी प्रकार का अतिरिक्त कन्वीनियंस चार्ज नहीं काटा जाता है। दूसरी तरफ, IRCTC की वेबसाइट अथवा थर्ड-पार्टी ऐप्स जैसे पेटीएम, मेकमायट्रिप या गूगल पे से ऑनलाइन टिकट बुक करने पर यात्रियों से सुविधा शुल्क लिया जाता है। नॉन-एसी क्लास के लिए यह शुल्क अमूमन ₹15 से ₹20 और एसी क्लास के लिए ₹30 से ₹40 के आसपास रहता है, जिस पर जीएसटी भी लागू होता है। इसके अलावा कई पेमेंट गेटवे अपने ट्रांजैक्शन चार्ज भी जोड़ते हैं। अकेले यात्रा करने वालों के लिए यह अंतर मामूली लग सकता है, लेकिन पूरे परिवार के आने-जाने के टिकट पर यह अंतर बजट को प्रभावित करता है।
टिकट रद्द कराने और उसका रिफंड पाने की प्रक्रिया में दोनों टिकटों का व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है। ऑनलाइन टिकट का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यात्रा रद्द होने की दशा में यात्री अपने मोबाइल से एक क्लिक में टिकट कैंसिल कर सकता है। कैंसिलेशन शुल्क कटने के बाद बची हुई राशि तीन से चार कार्यदिवसों में सीधे यात्री के उसी बैंक खाते, क्रेडिट कार्ड या यूपीआई वॉलेट में वापस भेज दी जाती है जिससे भुगतान किया गया था। काउंटर टिकट के मामले में प्रक्रिया जटिल है। काउंटर से खरीदा गया टिकट कैंसिल कराने के लिए यात्री को अनिवार्य रूप से नजदीकी रेलवे रिजर्वेशन काउंटर पर मूल टिकट लेकर जाना पड़ता है। हालांकि रेलवे ने काउंटर टिकट को ऑनलाइन कैंसिल करने की आंशिक सुविधा शुरू की है, लेकिन उस प्रक्रिया के तहत भी रिफंड की नकदी प्राप्त करने के लिए निर्धारित समयावधि के भीतर स्टेशन काउंटर पर जाना ही पड़ता है।
ट्रेन लेट होने, एसी खराब होने या रूट डायवर्ट होने जैसी अप्रत्याशित परिस्थितियों में रिफंड लेने के नियम भी दोनों व्यवस्थाओं में भिन्न हैं। आईआरसीटीसी से बुक किए गए ई-टिकट पर चार्ट बनने के बाद या ट्रेन रवाना होने से पहले ऑनलाइन टीडीआर (Ticket Deposit Receipt) फाइल करने की आसान सुविधा उपलब्ध होती है। यात्री घर बैठे सही कारण चुनकर टीडीआर दर्ज कर सकता है और रेलवे की समीक्षा के बाद रिफंड खाते में क्रेडिट हो जाता है। वहीं काउंटर टिकट के मामले में यात्री को स्टेशन मास्टर या आरक्षण पर्यवेक्षक से संपर्क करके भौतिक टीडीआर रसीद प्राप्त करनी होती है और फिर उसे दावों के निपटारे के लिए जोनल रेलवे कार्यालय में डाक अथवा व्यक्तिगत रूप से जमा कराना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में समय और श्रम दोनों अधिक खर्च होते हैं।
कागजी टिकट गुम हो जाने की स्थिति में काउंटर टिकट धारक को डुप्लीकेट टिकट बनवाने के लिए अतिरिक्त शुल्क देकर लंबी लिखा-पढ़ी से गुजरना पड़ता है। यदि ट्रेन छूटने से पहले काउंटर टिकट खो जाए तो यात्रा जोखिम भरी हो जाती है। इसके विपरीत, ई-टिकट कभी खोता नहीं है; मोबाइल में मौजूद एसएमएस, ईमेल या पीडीएफ कॉपी ही किसी भी सरकारी पहचान पत्र के साथ वैध मानी जाती है। इसके अतिरिक्त, बोर्डिंग स्टेशन में बदलाव करने की सुविधा आईआरसीटीसी ऐप पर कुछ सेकंड में उपलब्ध हो जाती है, जबकि काउंटर टिकट में बोर्डिंग बदलने के लिए ट्रेन छूटने से 24 घंटे पहले स्टेशन पर लिखित आवेदन देना अनिवार्य होता है।
अतः यदि सीट कन्फर्म होने की पूरी संभावना हो और समय बचाना प्राथमिकता हो, तो आईआरसीटीसी ऑनलाइन टिकट सबसे बेहतर और सुरक्षित विकल्प है। किंतु यदि सीट वेटिंग लिस्ट में जाने का अंदेशा हो और किसी भी हाल में सफर करना जरूरी हो, तो रेलवे काउंटर से लिया गया टिकट यात्रा के अधिकार की कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।
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