
कर्नाटक की राजनीति में आखिरकार वो बड़ा बदलाव हो ही गया जिसका लंबे समय से कयास लगाया जा रहा था। सिद्धारमैया की जगह डीके शिवकुमार को कमान सौंपना सिर्फ एक मुख्यमंत्री को बदलना नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस के भीतर चल रहे एक बड़े पीढ़ीगत बदलाव (Generational Shift) की गवाही देता है। जहां 77 साल के सिद्धारमैया एक मंझे हुए और अनुभवी नेता हैं, वहीं 64 साल के शिवकुमार सांगठनिक रूप से बेहद ऊर्जावान, आक्रामक और संकटमोचक माने जाते हैं।
कुछ समय पहले जब बीजेपी ने युवा चेहरे को आगे बढ़ाया था, तब 80 पार के कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के चलते मीडिया में कांग्रेस के पुराने ढर्रे पर खूब चर्चा हुई थी। लेकिन अब साफ दिख रहा है कि कांग्रेस अपनी राजनीतिक मजबूरियों और सामाजिक सीमाओं के बीच रहते हुए भी बहुत खामोशी से नए नेतृत्व की राह पर आगे बढ़ रही है।
दक्षिण भारत पर बड़ा दांव और खरगे की दूरदर्शी रणनीति
उत्तर और पश्चिम भारत में बीजेपी के बढ़ते वर्चस्व को रोकने के लिए कांग्रेस ने बहुत सोच-समझकर अपने सबसे मजबूत गढ़ यानी दक्षिण भारत पर पूरा फोकस किया है। इतिहास गवाह है कि आपातकाल के बाद जब 1977 के आम चुनाव में उत्तर भारत से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था, तब भी दक्षिण भारत ने ही पार्टी का हाथ थामा था। तमाम कोशिशों के बावजूद बीजेपी आज भी दक्षिण के राज्यों में वैसी पैठ नहीं बना पा रही है।
हालांकि दक्षिण भारत के पास लोकसभा की सिर्फ 131 सीटें हैं, जिससे केंद्र की सत्ता का समीकरण पूरी तरह नहीं बदलता, लेकिन कांग्रेस जानती है कि यहां अपना वर्चस्व बनाए रखना उसके लिए अपेक्षाकृत आसान है। यही वजह थी कि नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनते समय उम्रदराज होने के बावजूद मल्लिकार्जुन खरगे पर भरोसा जताया गया, ताकि दक्षिण का किला पूरी तरह सुरक्षित और एकजुट रहे।
पीढ़ीगत बदलाव: राज्यों में कमान संभाल रही है नई पौध
कांग्रेस अब धीरे-धीरे अपने बुजुर्ग नेताओं को आराम देकर नए और अपेक्षाकृत युवा चेहरों को आगे कर रही है। केरल का उदाहरण सबके सामने है, जहां पार्टी ने रमेश चेन्निथला (69 वर्ष) और केसी वेणुगोपाल (64 वर्ष) जैसे कद्दावर नामों को पीछे रखकर 61 साल के वीडी सतीशन को आगे बढ़ाया। सतीशन को जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ सबसे बड़े सहयोगी दल ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ का भी खुला समर्थन हासिल था।
सिर्फ केरल ही नहीं, देश के अन्य राज्यों में भी कांग्रेस ने लीडरशिप की नई टीम तैयार कर दी है:
संगठन में हो रहे इस बदलाव से साफ है कि आने वाले समय में पंजाब में भी नेतृत्व परिवर्तन कभी भी संभव है, वहीं राजस्थान में सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं का इंतजार भी जल्द समाप्त होने की उम्मीदें बढ़ गई हैं।
कर्नाटक की सामाजिक उलझन और शिवकुमार की जरूरत
कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन करना आलाकमान के लिए लोहे के चने चबाने जैसा था, क्योंकि यहां की पूरी सियासत बेहद पेचीदा सामाजिक समीकरणों (Social Engineering) पर टिकी है। सिद्धारमैया कुरुबा (OBC) समुदाय के बहुत बड़े नेता हैं। आज के दौर में कोई भी राजनीतिक दल इतने बड़े ओबीसी वोट बैंक को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।
कर्नाटक के तीन सबसे ताकतवर राजनीतिक समुदाय
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लिंगायत: जो पारंपरिक रूप से बीजेपी के मजबूत समर्थक माने जाते हैं।
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वोक्कालिगा: जिसके सबसे बड़े चेहरे पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा रहे हैं, लेकिन अब डीके शिवकुमार इस समुदाय के सर्वमान्य नेता के रूप में उभरे हैं।
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कुरुबा व अहिंडा: जो सिद्धारमैया के साथ मजबूती से खड़ा रहा और 2023 के चुनाव में कांग्रेस की जीत का बड़ा आधार बना।
कांग्रेस के इस फैसले के क्या हैं मायने?
सिद्धारमैया को हटाने के बाद स्वाभाविक है कि बीजेपी अब कांग्रेस को ‘ओबीसी विरोधी’ के तौर पर पेश करने की कोशिश करेगी। इसी राजनीतिक जोखिम के चलते आलाकमान ने नेतृत्व परिवर्तन का फैसला लेने में इतना लंबा वक्त लगाया। हालांकि, राज्यसभा जाने से साफ इनकार करने के बाद सिद्धारमैया के अगले कदम को लेकर राजनीतिक गलियारों में अटकलें लगती रहेंगी।
लेकिन अगर व्यावहारिक धरातल पर देखा जाए, तो साल 2028 का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस को जिस तेजतर्रार, संसाधन संपन्न और आक्रामक सांगठनिक नेतृत्व की जरूरत थी, उस कसौटी पर डीके शिवकुमार बिल्कुल खरे उतरते हैं। दक्षिण में अपनी पकड़ मजबूत बनाते हुए तमिलनाडु में विजय की पार्टी टीवीके (TVK) और आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की पार्टी से गठबंधन की कोशिशें यह साफ करती हैं कि कांग्रेस अब भविष्य की राजनीति के लिए बिल्कुल नए और व्यावहारिक रास्ते चुन रही है।
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