
जिम, एरोबिक्स या रनिंग करने वाले फिटनेस प्रेमियों के बीच यह धारणा बहुत आम है कि वर्कआउट के दौरान जितना ज्यादा पसीना बहेगा, शरीर से उतनी ही तेजी से चर्बी यानी फैट पिघलेगा। इसी गलतफहमी के चलते कई लोग भीषण गर्मी में पंखा बंद करके कसरत करते हैं, स्वेट सूट (Sweat Suits) पहनते हैं या घंटों सौना बाथ लेते हैं ताकि अधिक से अधिक पसीना बहा सकें। वजन तौलने वाली मशीन पर कसरत के तुरंत बाद 500 ग्राम से 1 किलो वजन कम देखकर लोग खुश भी हो जाते हैं। हालांकि, मेडिकल साइंस, स्पोर्ट्स न्यूट्रिशन और एंडोक्रिनोलॉजी के अनुसार ज्यादा पसीना निकलने का मतलब अधिक फैट बर्न होना बिल्कुल नहीं है। डॉक्टरों के मुताबिक, पसीने और चर्बी घटने के बीच कोई सीधा संबंध नहीं होता।
पसीना आने का असली वैज्ञानिक कारण: शरीर का कूलिंग सिस्टम
मानव शरीर में पसीना आना केवल एक ‘थर्मोरेगुलेटरी मैकेनिज्म’ (Thermoregulation) है। जब हम कोई भारी शारीरिक गतिविधि या कसरत करते हैं, तो आंतरिक मांसपेशियों की सक्रियता से शरीर का तापमान बढ़ने लगता है।
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मस्तिष्क का हाइपोथैलेमस हिस्सा शरीर के तापमान को सामान्य (लगभग 37°C) बनाए रखने के लिए त्वचा में मौजूद लगभग 20 से 40 लाख ‘एक्राइन स्वेट ग्लैंड्स’ (Eccrine Sweat Glands) को सक्रिय कर देता है।
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ये ग्रंथियां शरीर से पानी, सोडियम और सूक्ष्म खनिजों को त्वचा की सतह पर छोड़ती हैं।
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जब यह पसीना हवा में वाष्पीकृत (Evaporate) होता है, तो शरीर को ठंडक मिलती है। यानी पसीना सिर्फ और सिर्फ शरीर को ठंडा रखने की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, न कि फैट बर्न होने का पैमाना।
वर्कआउट के तुरंत बाद घटने वाला वजन असल में क्या है?
कसरत के ठीक बाद जब आप वेइंग स्केल पर कम वजन देखते हैं, तो वह ‘फैट लॉस’ नहीं बल्कि केवल ‘वॉटर वेट लॉस’ (Water Weight) होता है। जैसे ही आप कसरत के बाद दो-तीन गिलास पानी पीते हैं या भोजन करते हैं, शरीर दोबारा उस पानी को सोख लेता है और वजन वापस अपनी पुरानी स्थिति में आ जाता है। यदि कोई व्यक्ति बिना पसीना बहाए भी वातानुकूलित (AC) कमरे में उचित हार्ट रेट जोन में कसरत करता है, तो भी वह उतनी ही कैलोरी और फैट बर्न करता है।
शरीर में फैट असल में कैसे बर्न और बाहर होता है?
बायोकेमिकल नजरिए से जब हम कैलोरी डेफिसिट में होते हैं और एक्सरसाइज करते हैं, तो शरीर में जमा फैट (ट्राइग्लिसराइड्स) टूटकर ऊर्जा में बदलता है। इस रासायनिक प्रक्रिया में फैट के टूटने से कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) और पानी ($H_2O$) बनता है।
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ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (BMJ) में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, बर्न हुए फैट का लगभग 84 प्रतिशत हिस्सा हमारी सांसों (कार्बन डाइऑक्साइड) के जरिए फेफड़ों से बाहर निकलता है।
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शेष 16 प्रतिशत हिस्सा पेशाब, पसीने और अन्य शारीरिक तरल पदार्थों के माध्यम से बाहर निकलता है। इसलिए फैट पिघलने का संबंध सांस लेने की दर और मेटाबॉलिज्म से है, न कि केवल पसीना बहने से।
कुछ लोगों को ज्यादा और कुछ को कम पसीना क्यों आता है?
हर व्यक्ति में पसीना आने की मात्रा अलग-अलग होती है, जो कई जैविक कारकों पर निर्भर करती है:
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जेनेटिक्स और स्वेट ग्लैंड्स की संख्या: कुछ लोगों में जन्मजात रूप से पसीने की ग्रंथियां अधिक सक्रिय होती हैं।
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मौसम और आर्द्रता (Humidity): नम मौसम में पसीना आसानी से सूखता नहीं है, जिससे लगता है कि बहुत ज्यादा पसीना आ रहा है।
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शारीरिक वजन: भारी शरीर वाले व्यक्तियों को खुद को ठंडा रखने के लिए अधिक ऊर्जा लगानी पड़ती है, जिससे उन्हें पसीना ज्यादा आता है।
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फिटनेस लेवल: फिट एथलीटों का शरीर तापमान नियंत्रण में इतना कुशल हो जाता है कि उनका कूलिंग सिस्टम जल्दी पसीना छोड़ना शुरू कर देता है।
जबरन पसीना बहाने के गंभीर खतरे
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गंभीर डिहाइड्रेशन: शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की भारी कमी होने से चक्कर आना, मांसपेशियों में ऐंठन और बेहोशी का खतरा रहता है।
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हीट स्ट्रोक: तापमान बहुत अधिक बढ़ जाने और पसीना न सूखने की स्थिति में हीट एग्जॉशन या हीट स्ट्रोक हो सकता है, जो जानलेवा साबित हो सकता है।
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किडनी पर दबाव: अत्यधिक पसीने के बाद पर्याप्त पानी न पीने से किडनी पर अतिरिक्त तनाव पड़ता है।
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