
सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में भगवान शिव को ‘त्रिलोचन’ यानी तीन नेत्रों वाला कहा गया है। महादेव की तीसरी आंख प्रलय, ज्ञान, विवेक और असीम ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है। शिव महापुराण और महाभारत के अनुशासन पर्व में एक अत्यंत रोचक और रहस्यमयी पौराणिक प्रसंग का वर्णन मिलता है, जब जगत जननी मां पार्वती के एक छोटे से कौतूहल और मजाक के कारण पूरे चराचर ब्रह्मांड में भयानक अंधकार छा गया था। सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश एकाएक लुप्त हो गया और समस्त देवता व जीव-जंतु त्राहि-त्राहि करने लगे थे। इस महासंकट से सृष्टि की रक्षा करने के लिए भगवान शिव को अपने ललाट पर तीसरे नेत्र को प्रकट करना पड़ा था।
मां पार्वती का खेल और सृष्टि में छा गया महा-अंधकार
शिव पुराण की कथा के अनुसार, एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और मां पार्वती एकांत में विराजमान थे। वातावरण अत्यंत शांत और आनंदमय था।
-
इसी दौरान मां पार्वती के मन में एक चंचल कौतूहल जागा और उन्होंने पीछे से आकर अपने दोनों कोमल हाथों से महादेव की दोनों आंखें बंद कर दीं।
-
महादेव की दोनों आंखों में से एक नेत्र को सूर्य और दूसरे को चंद्रमा का स्वरूप माना जाता है।
-
जैसे ही माता पार्वती के हाथों ने शिव के दोनों नेत्र ढके, समस्त ब्रह्मांड से एक क्षण में सूर्य और चंद्रमा की रोशनी पूरी तरह गायब हो गई।
-
तीनों लोकों में ऐसा घोर और भयानक अंधकार छा गया जैसे महाप्रलय आ गई हो। पृथ्वी पर पेड़-पौधों, ऋषियों, मनुष्यों और स्वर्ग में देवताओं के बीच हाहाकार मच गया।
ललाट से प्रकट हुई तीसरी आंख और विनाशकारी अग्नि
सृष्टि में मचे इस भीषण हाहाकार और अंधकार को मिटाने के लिए भगवान शिव ने अपने ललाट (माथे) के मध्य में स्थित ‘तीसरे नेत्र’ (The Third Eye) को अचानक खोल दिया।
-
तीसरा नेत्र खुलते ही उसमें से करोड़ों सूर्यों के समान एक अत्यंत दिव्य, प्रखर और विनाशकारी ज्योति पुंज प्रस्फुटित हुआ।
-
इस असीम प्रकाश से पूरे ब्रह्मांड का अंधकार तो पलभर में दूर हो गया, लेकिन तीसरे नेत्र से निकलने वाली प्रचंड ज्वाला और गर्मी से हिमालय पर्वत धधकने लगा और जीव-जंतु झुलसने लगे।
-
मां पार्वती ने जब देखा कि उनके एक मजाक से महादेव का तीसरा नेत्र खुल गया है और उसकी तपन से पर्वत और वन जल रहे हैं, तो उन्होंने भयभीत और हाथ जोड़कर भगवान शिव से उस प्रचंड अग्नि को शांत करने की विनती की। महादेव ने माता की प्रार्थना सुनकर तीसरे नेत्र के प्रभाव को शांत और सामान्य किया।
माता पार्वती के पसीने से कैसे हुआ ‘अंधकासुर’ का जन्म?
इस पौराणिक प्रसंग से एक और अत्यंत शक्तिशाली असुर के जन्म की कथा भी जुड़ी हुई है:
-
जब महादेव के तीसरे नेत्र से भयंकर अग्नि और ताप उत्पन्न हुआ, तो भय और अत्यधिक गर्मी के कारण माता पार्वती के हाथों से पसीना निकलने लगा।
-
माता पार्वती के उसी पसीने और महादेव के तेज के मिलन से एक अत्यंत बलवान, भयानक और अंधा बालक उत्पन्न हुआ।
-
अंधकार के समय उत्पन्न होने और नेत्रहीन होने के कारण इस बालक का नाम अंधक (Andhaka) पड़ा।
-
बाद में भगवान शिव ने इस बालक को अपने परम भक्त दैत्यराज हिरण्याक्ष को वरदान स्वरूप गोद दे दिया, जिसने आगे चलकर घोर तपस्या कर शक्तियां हासिल कीं और बाद में ‘अंधकासुर’ के नाम से जाना गया।
भगवान शिव की तीसरी आंख का आध्यात्मिक और दार्शनिक संदेश
धार्मिक और यौगिक दृष्टिकोण से भगवान शिव का तीसरा नेत्र केवल कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गहरा आध्यात्मिक रहस्य समेटे हुए है।
-
आज्ञा चक्र का प्रतीक: योग शास्त्र में दोनों भौहों के बीच स्थित चक्र को ‘आज्ञा चक्र’ (Ajna Chakra) कहा जाता है। यह आंतरिक ज्ञान, अंतर्ज्ञान (Intuition) और भ्रम को भस्म करने की शक्ति का केंद्र है।
-
काम और वासना का नाश: जिस प्रकार महादेव ने अपने तीसरे नेत्र से कामदेव को भस्म कर दिया था, उसी प्रकार यह नेत्र यह संदेश देता है कि जब मनुष्य अपनी अंतरात्मा और विवेक को जाग्रत करता है, तो उसके भीतर का अज्ञान, काम, क्रोध और मोह रूपी अंधकार हमेशा के लिए नष्ट हो जाता है।
girls globe