
हिंदू धर्म और वैदिक पंचांग में श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि का विशेष आध्यात्मिक व धार्मिक महत्व है। यह पावन दिन पवित्र सावन महीने का अंतिम दिन होता है और इसी दिन भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक ‘रक्षाबंधन’ (Raksha Bandhan) का महापर्व भी मनाया जाता है। इसके साथ ही सावन पूर्णिमा पर भगवान शिव का अंतिम जलाभिषेक, भगवान सत्यनारायण की कथा, चंद्र देव की पूजा और ब्राह्मणों द्वारा ‘जनेऊ परिवर्तन’ (उपाकर्म संस्कार) करने की समृद्ध परंपरा है। इस वर्ष पूर्णिमा तिथि के प्रारंभ और समापन समय को लेकर लोगों के मन में संशय बना हुआ है कि सावन पूर्णिमा का व्रत 27 अगस्त को रखा जाए या 28 अगस्त को। आइए जानते हैं पंचांग के अनुसार सही तारीख, शुभ मुहूर्त, चंद्र दर्शन और पूजा की पूरी विधि।
सावन पूर्णिमा 2026: 27 या 28 अगस्त, कब रखें व्रत?
वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ और समापन इस प्रकार रहेगा:
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पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 27 अगस्त 2026 को शाम 08:31 बजे से
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पूर्णिमा तिथि समाप्त: 28 अगस्त 2026 को शाम 06:17 बजे तक
शास्त्रों के अनुसार व्रत और पर्व का निर्णय:
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श्रावण पूर्णिमा व्रत और सत्यनारायण पूजा: शास्त्रों में पूर्णिमा का उपवास उदयातिथि और चंद्रोदय दोनों के आधार पर निर्धारित होता है। उदयातिथि के अनुसार पूर्णिमा तिथि का सूर्योदय 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार) को प्राप्त हो रहा है, इसलिए सावन पूर्णिमा का व्रत, पवित्र नदियों में स्नान-दान और पूजा-पाठ 28 अगस्त को ही करना सर्वश्रेष्ठ और शास्त्रसम्मत रहेगा।
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रक्षाबंधन का त्योहार: रक्षाबंधन का पावन पर्व भी उदयातिथि में पूर्णिमा रहने के कारण 28 अगस्त 2026 को ही पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा।
सावन पूर्णिमा पूजा और स्नान-दान का शुभ मुहूर्त
28 अगस्त 2026 को पूरे दिन पूजा और दान-पुण्य के कई शुभ मुहूर्त बन रहे हैं:
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ब्रह्म मुहूर्त (पवित्र स्नान के लिए): सुबह 04:28 बजे से 05:13 बजे तक
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अमृत काल मुहूर्त: सुबह 06:45 बजे से 08:22 बजे तक
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अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:56 बजे से दोपहर 12:47 बजे तक
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गोधूलि मुहूर्त (शाम की पूजा): शाम 06:48 बजे से 07:10 बजे तक
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चंद्रोदय समय (अर्घ्य के लिए): शाम 06:50 बजे (विभिन्न शहरों में 5-10 मिनट का अंतर संभव)
सावन पूर्णिमा व्रत की सरल पूजा विधि
सावन पूर्णिमा के दिन भगवान शिव, मां पार्वती, भगवान विष्णु और चंद्र देव की संयुक्त पूजा करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है:
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प्रातः स्नान और संकल्प: सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल मिले जल से स्नान करें और स्वच्छ सफेद या पीले वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लें।
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भगवान शिव का जलाभिषेक: शिवलिंग पर गंगाजल, कच्चा दूध, दही, शहद, बेलपत्र, धतूरा और भस्म अर्पित करें। ‘ॐ नमः शिवाय’ और महामृत्युंजय मंत्र का जप करें।
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सत्यनारायण भगवान की पूजा: दोपहर या अभिजीत मुहूर्त में भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाएं, पीले फूल, तुलसी दल और पंजीरी-पंचामृत का भोग लगाकर श्री सत्यनारायण की कथा का श्रवण करें।
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शाम को चंद्र देव को अर्घ्य: शाम को चंद्रोदय होने पर तांबे या चांदी के लोटे में जल, कच्चा दूध, अक्षत और सफेद फूल डालकर चंद्र देव को ‘ॐ सों सोमाय नमः’ मंत्र के साथ अर्घ्य दें।
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दान का महत्व: पूजा के बाद किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को भोजन, वस्त्र, फल और तिल का दान अवश्य करें।
सावन पूर्णिमा पर भद्रा का साया और राखी बांधने का समय
पूर्णिमा तिथि पर भद्रा की उपस्थिति को लेकर विशेष सावधानी बरती जाती है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, 27 अगस्त की रात को भद्रा की शुरुआत होगी जो 28 अगस्त की सुबह समाप्त हो जाएगी। इसके चलते 28 अगस्त को दिन के समय रक्षाबंधन का पर्व मनाने और राखी बांधने के लिए भद्रा का कोई अशुभ साया नहीं रहेगा। बहनें सुबह से लेकर शाम तक शुभ चौघड़िया मुहूर्त में अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध सकेंगी।
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