
देश के मध्यम वर्ग और बैंक से लोन लेकर घर या गाड़ी खरीदने वाले करोड़ों कर्जदारों के लिए आने वाले समय में वित्तीय चुनौतियां बढ़ सकती हैं। वैश्विक और घरेलू बाजार में महंगाई के बढ़ते दबाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के रुख के बीच प्रमुख ब्रोकरेज और वित्तीय रेटिंग एजेंसियों ने यह अनुमान जताया है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) आगामी मौद्रिक नीतियों में ब्याज दरों में बढ़ोतरी का चक्र दोबारा शुरू कर सकता है। हालिया विश्लेषणात्मक रिपोर्टों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही और आगामी वित्त वर्ष 2027 (FY27) के दौरान केंद्रीय बैंक की रेपो दर 75 बेसिस प्वाइंट तक बढ़कर 6.00% के स्तर पर पहुंच सकती है। यदि यह अनुमान सच साबित होता है, तो बैंकों द्वारा एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR) में सीधे इजाफा किया जाएगा, जिससे फ्लोटिंग रेट पर चल रहे होम लोन, ऑटो लोन और पर्सनल लोन की मासिक किस्त यानी ईएमआई (EMI) में तेज उछाल देखने को मिलेगा।
रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के सामने इस समय महंगाई को 4 प्रतिशत के लक्ष्य के करीब बनाए रखने की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार मजबूती और डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में बने दबाव के कारण आयातित महंगाई (Imported Inflation) का खतरा लगातार बना हुआ है। इसके अलावा देश में खाद्य और सेवा क्षेत्र की मुद्रास्फीति में भी हाल के महीनों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि मजबूत आर्थिक वृद्धि (GDP Growth) के बीच यदि हेडलाइन सीपीआई मुद्रास्फीति 5 प्रतिशत से ऊपर बनी रहती है, तो आरबीआई को आर्थिक स्थिरता बनाए रखने और सरकारी बॉन्ड यील्ड्स पर बढ़ते दबाव को संतुलित करने के लिए दरें बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्रीय बैंक 25-25 बेसिस प्वाइंट्स की किस्तों में ब्याज दरें बढ़ाकर इसे 5.25% के मौजूदा स्तर से बढ़ाकर 5.75% से 6.00% के दायरे में ला सकता है।
रिजर्व बैंक के नियमों के मुताबिक, अक्टूबर 2019 के बाद बैंकों द्वारा दिए जाने वाले सभी नए रिटेल लोन (जैसे होम लोन और ऑटो लोन) अनिवार्य रूप से किसी बाहरी बेंचमार्क से जुड़े होते हैं, जिसे रेपो लिंक्ड लेंडिंग रेट (RLLR) या ईबीएलआर (EBLR) कहा जाता है। इसका सीधा और व्यावहारिक अर्थ यह है कि जैसे ही आरबीआई अपनी नीतिगत रेपो दर में 0.25% या 0.50% की वृद्धि करता है, वाणिज्यिक बैंक (जैसे SBI, HDFC Bank, ICICI Bank, PNB आदि) कुछ ही दिनों के भीतर अपने कर्ज की ब्याज दरों में उतनी ही बढ़ोतरी कर देते हैं। इसका सबसे तात्कालिक असर फ्लोटिंग रेट वाले कर्जदारों पर पड़ता है। ब्याज दर बढ़ते ही या तो ग्राहक की मासिक ईएमआई बढ़ जाती है, या फिर बैंक लोन की अवधि (Tenure) को कई महीनों या सालों के लिए बढ़ा देते हैं, जिससे कुल ब्याज का बोझ भारी हो जाता है।
यदि रेपो रेट में 75 बेसिस प्वाइंट्स (0.75%) की कुल वृद्धि होती है, तो इसका असर आम कर्जदार की जेब पर किस तरह पड़ेगा, इसे एक सरल वित्तीय उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी ग्राहक ने ₹30 लाख का होम लोन 20 साल की अवधि के लिए 8.50% की ब्याज दर पर लिया है। वर्तमान में उसकी मासिक ईएमआई लगभग ₹26,035 बैठती है। यदि बैंक ब्याज दर को 0.75% बढ़ाकर 9.25% कर देते हैं, तो वही ईएमआई बढ़कर ₹27,476 प्रति माह हो जाएगी। यानी हर महीने लगभग ₹1,441 का सीधा अतिरिक्त खर्च जेब से निकलेगा। 20 साल के पूरे कार्यकाल में यह मामूली सा दिखने वाला अंतर कुल ब्याज भुगतान में करीब ₹3.45 लाख से अधिक की अतिरिक्त चपत लगा देता है। इसी तरह यदि किसी का ₹50 लाख का लोन 20 साल के लिए चल रहा है, तो 8.50% से 9.25% दर होने पर मासिक ईएमआई ₹43,391 से सीधे बढ़कर ₹45,793 हो जाएगी, जिससे हर महीने ₹2,400 से ज्यादा और कुल लोन अवधि में लगभग ₹5.76 लाख अतिरिक्त ब्याज भरना पड़ेगा।
रेपो रेट बढ़ने का एक पहलू जहां लोन लेने वालों के लिए झटका साबित होता है, वहीं बचत करने वाले आम नागरिकों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह राहत भरी खबर होती है। जैसे ही नीतिगत दरें ऊपर जाती हैं, बैंकों को सिस्टम में लिक्विडिटी यानी नकदी जुटाने के लिए अपनी जमा दरों में भी संशोधन करना पड़ता है। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और आवर्ती जमा (RD) पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी करेंगे। जो बुजुर्ग या निवेशक बैंक एफडी के भरोसे अपने नियमित खर्च चलाते हैं, उन्हें अपनी जमा पूंजी पर बेहतर रिटर्न और सुरक्षित मासिक आय का लाभ मिलना शुरू हो जाएगा।
यदि वित्त वर्ष 2027 में ब्याज दरों में बढ़ोतरी का चक्र शुरू होता है, तो कर्जदारों को अपने पारिवारिक बजट को बिगड़ने से बचाने के लिए समय रहते कुछ व्यावहारिक वित्तीय कदम उठाने चाहिए। सबसे पहला कदम यह है कि हर वित्तीय वर्ष में अपनी बचत या वार्षिक बोनस का एक हिस्सा निकालकर लोन के मूलधन का आंशिक प्री-पेमेंट (Part Prepayment) करें। मूलधन कम होने से ब्याज का भार तेजी से घटता है। दूसरा तरीका यह है कि यदि आपके बैंक की ब्याज दर अन्य प्रतिस्पर्धी बैंकों की तुलना में काफी अधिक चल रही है, तो अपने वर्तमान बैंक से लोन रीसेट (Resetting) की बात करें या कम ब्याज दर वाले बैंक में बैलेंस ट्रांसफर (Home Loan Balance Transfer) के विकल्प पर विचार करें। इसके अलावा, गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करके पहले से ही मासिक ईएमआई के लिए 10 से 15 प्रतिशत का अतिरिक्त बफर अपने बजट में सुरक्षित रखना वित्तीय समझदारी साबित होगा।
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