पाकिस्तान की बढ़ गई टेंशन, तालिबान और रूस के बीच हुई ऐतिहासिक ‘सैन्य डील’, भारत के लिए खुल गए रणनीतिक फायदे के रास्ते

दक्षिण एशिया के सियासी और रणनीतिक गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को आधिकारिक तौर पर मान्यता देने के महज एक साल के भीतर ही महाशक्ति रूस ने उसके साथ एक बड़ा सैन्य सहयोग समझौता (Military Cooperation Pact) कर लिया है। भू-राजनीति (Geopolitics) के जानकारों का मानना है कि मॉस्को और काबुल के बीच बढ़ती यह रणनीतिक नजदीकियां पूरे दक्षिण एशिया का भूगोल और समीकरण बदलने का माद्दा रखती हैं। इस ऐतिहासिक कदम से जहां एक तरफ पाकिस्तान पूरी तरह अलग-थलग पड़ता दिख रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारत के लिए यह घटनाक्रम कई नए और सुनहरे रणनीतिक अवसर लेकर आया है।

मॉस्को में बंद कमरे में हुई महा-डील, पुराने दुश्मनों में बढ़ी नजदीकियां

इस बेहद संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल रक्षा समझौते की पटकथा मॉस्को में आयोजित ‘इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम’ की हाई-लेवल बैठक के दौरान लिखी गई। इस दौरान अफगानिस्तान के कार्यवाहक रक्षा मंत्री मुल्ला मोहम्मद याकूब और रूसी सुरक्षा परिषद के कद्दावर सचिव सर्गेई शोइगु के बीच लंबी बातचीत हुई, जिसके बाद दोनों देशों ने रक्षा सहयोग के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए। हालांकि, दोनों ही पक्षों ने इस सैन्य समझौते की बारीक और गुप्त शर्तों को अभी दुनिया के सामने सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन काबुल ने इसे दोनों देशों के बीच भविष्य के रिश्तों की नई इबारत बताया है। रक्षा मंत्री याकूब ने बैठक के तुरंत बाद कहा कि रूस के साथ बातचीत हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है और हम इस ऐतिहासिक रिश्ते को एक नए मुकाम पर ले जाना चाहते हैं।

यह पूरा घटनाक्रम रूस और अफगानिस्तान के इतिहास को देखते हुए किसी बड़े चमत्कार से कम नहीं है। याद दिला दें कि साल 1979 में तत्कालीन सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर हमला किया था और मुजाहिदीनों के साथ करीब एक दशक तक खूनी जंग लड़ी थी, जिन्होंने बाद में आगे चलकर तालिबान का गठन किया। आज उसी तालिबान के समर्थन में रूसी अधिकारी सर्गेई शोइगु ने पश्चिमी देशों (अमेरिका और नाटो) को आड़े हाथों लेते हुए काबुल पर लगे तमाम आर्थिक प्रतिबंधों को तुरंत हटाने और उनके फंड्स को अनफ्रीज करने की पुरजोर वकालत की है। रूस ने साफ कहा कि पश्चिमी देशों को अफगानिस्तान में अपनी 20 साल की तबाही की पूरी जिम्मेदारी खुद लेनी होगी।

भारत के लिए क्यों गेमचेंजर साबित होगा रूस-तालिबान का यह नया गठबंधन?

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों की मानें तो रूस और तालिबान के बीच का यह सैन्य तालमेल भारत की विदेश नीति और रणनीतिक हितों के लिए बेहद मुफीद साबित हो सकता है। अफगानिस्तान की धरती पर लंबे समय से पाकिस्तान अपने छद्म एजेंडे और प्रभाव का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करता रहा है। ऐसे में यदि भारत का पुराना और सबसे भरोसेमंद रक्षा साझेदार रूस वहां अपनी मजबूत सैन्य और कूटनीतिक पैठ बनाता है, तो क्षेत्रीय समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे।

भारत हमेशा से अपने घोर विरोधी पाकिस्तान को बाईपास (बाईं तरफ छोड़ते हुए) करते हुए अफगानिस्तान के सीधे रास्ते से मध्य एशिया (Central Asia) के देशों के साथ व्यापार और कनेक्टिविटी को मजबूत करने की बड़ी महत्वाकांक्षा रखता है। रूस की काबुल में एंट्री से भारत का यह पुराना सपना सच हो सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस समझौते के बाद अब अफगानिस्तान के पूरी तरह से पाकिस्तान या चीन के प्रभाव वाले ‘कंट्रोल जोन’ में जाने का खतरा हमेशा के लिए टल गया है, जो नई दिल्ली के लिए बहुत बड़ी राहत की बात है।

पाकिस्तान के पेट में क्यों उठा दर्द? इस्लामाबाद की रातों की उड़ी नींद

रूस और तालिबान के बीच हुआ यह सैन्य समझौता सीधे तौर पर पाकिस्तान की दुखती रग पर हाथ रखने जैसा है। अफगानिस्तान में खुद को ‘किंगमेकर’ समझने वाले पाकिस्तान के पैरों के नीचे से अचानक जमीन खिसक गई है। हाल के दिनों में डूरंड लाइन (सीमा) पर हुई हिंसक झड़पों, आतंकी वारदातों और पाकिस्तानी एयरस्ट्राइक के कारण काबुल और इस्लामाबाद के रिश्ते इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। पाकिस्तान लगातार आरोप लगाता रहा है कि तालिबान अपनी सरजमीं पर पाकिस्तान विरोधी आतंकियों (TTP) को पनाह दे रहा है, जबकि तालिबान ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए पाकिस्तानी सेना की कायराना हरकतों की हमेशा निंदा की है।

साल की शुरुआत में दोनों देशों के बीच तनाव तब चरम पर पहुंच गया था जब पाकिस्तानी वायुसेना ने अफगान सीमा के भीतर घुसकर बमबारी की थी, जिसे तालिबान ने अपनी संप्रभुता पर हमला बताया था। ऐसे बेहद तनावपूर्ण और तल्ख माहौल के बीच, रूस जैसा महाशक्तिशाली देश यदि तालिबान को सैन्य और रणनीतिक ताकत देता है, तो यह पाकिस्तान के बचे-कुचे प्रभाव को भी पूरी तरह खत्म कर देगा। यही वजह है कि रूस-तालिबान की इस जुगलबंदी से इस्लामाबाद के रणनीतिकारों की नींद उड़ चुकी है।