बंगाल में अब खुलेगी कामदुनी फाइल आरजी कर के बाद शुभेंदु सरकार का एक और बड़ा एक्शन

पश्चिम बंगाल की सत्ता बदलते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की नई सरकार पूरी तरह एक्शन मोड में आ चुकी है। ममता बनर्जी सरकार के कार्यकाल के दौरान हुई हिंसा और अपराध से जुड़ी पुरानी फाइलों की धूल अब साफ होने लगी है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में हुए झकझोर देने वाले गैंगरेप और मर्डर केस की फाइल दोबारा खोले जाने के बाद, अब बंगाल के एक और बहुचर्चित और रूह कंपा देने वाले ‘कामदुनी गैंगरेप केस’ की फाइल को फिर से खोलने की सुगबुगाहट बेहद तेज हो गई है। बंगाल की राजनीतिक आबोहवा में इस बात के पुख्ता संकेत खुद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने दिए हैं।

भाजपा दफ्तर पहुंचे पीड़िता के परिजन, नई जांच की मांग तेज

दरअसल, इस पूरे मामले ने तब तूल पकड़ा जब सोमवार (25 मई) को कामदुनी गैंगरेप पीड़िता की मां और भाई अचानक कोलकाता के साल्ट लेक स्थित भाजपा कार्यालय पहुंचे। उनके साथ कामदुनी आंदोलन की प्रमुख चेहरा और एक्टिविस्ट टुम्पा कयाल भी मौजूद थीं। यहाँ इन सभी ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य से एक बेहद अहम मुलाकात की। सूत्रों के मुताबिक, बंद कमरे में हुई इस मुलाकात के दौरान कामदुनी गैंगरेप कांड की नए सिरे से निष्पक्ष जांच कराने को लेकर गंभीर चर्चा हुई है। बंगाली मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी अगले सोमवार को एक सार्वजनिक जनसभा के दौरान कामदुनी पीड़िता के परिवार से खुद मुलाकात कर सकते हैं, जिससे इस केस में बड़े यू-टर्न की उम्मीद बढ़ गई है।

3 IPS अफसरों के सस्पेंशन के बाद अपराधियों में खौफ

बंगाल में सत्ता परिवर्तन होते ही जिस तरह से कानून व्यवस्था को लेकर कड़े कदम उठाए गए हैं, उसने अपराधियों की नींद उड़ा दी है। आरजी कर मामले की फाइलें खुलते ही ममता सरकार के करीबी माने जाने वाले 3 बड़े आईपीएस अफसरों – विनीत गोयल, इंदिरा मुखर्जी और अभिषेक गुप्ता को सस्पेंड कर दिया गया है। पुलिस महकमे में हुई इस बड़ी सर्जरी के बाद अब राजनीतिक और सामाजिक हलकों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या अब ‘कामदुनी फाइलों’ के जरिए तत्कालीन व्यवस्था के लूपहोल्स को बेनकाब करने की बारी आ चुकी है?

क्या था साल 2013 का खौफनाक कामदुनी गैंगरेप केस?

यह दर्दनाक दास्तान 7 जून 2013 की है, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना जिले के बारासात के अंतर्गत आने वाले कामदुनी गांव में 21 साल की एक छात्रा (बीए सेकंड ईयर) कॉलेज से अपने घर लौट रही थी। इसी दौरान नौ दरिंदों ने उसका अपहरण कर लिया। आरोपी उसे एक सूनसान जगह पर स्थित बंद फैक्ट्री में ले गए, जहाँ उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। हैवानियत यहीं नहीं रुकी, गैंगरेप के बाद पीड़िता की बेरहमी और निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई। अगले दिन छात्रा का शव पास के ही एक खेत से बोरे में बंद मिला था। इस घटना के बाद स्थानीय लोगों का गुस्सा फूट पड़ा था और इंसाफ के लिए ‘कामदुनी प्रतिवादी मंच’ नाम से एक बड़ा जनांदोलन खड़ा हुआ था।

निचली अदालत का फैसला: तीन को फांसी, तीन को उम्रकैद

जनाक्रोश और चौतरफा दबाव के बाद पुलिस ने इस मामले में कुल नौ लोगों को गिरफ्तार किया था, जिनमें से एक आरोपी की ट्रायल के दौरान ही मौत हो गई थी। जनवरी 2016 में कोलकाता की एक निचली अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए छह अभियुक्तों को दोषी करार दिया था, जबकि दो को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। अदालत ने अंसार अली, शेख अमीन अली और सैफ़ुल अली को इस जघन्य अपराध का मुख्य दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी, जबकि अमीनुर इस्लाम, शोख इनामुल और भोलानाथ को ताउम्र कैद की सजा दी गई थी।

जब हाई कोर्ट के फैसले से टूट गया था परिवार का दिल

इस मामले में असली मोड़ तब आया जब निचली अदालत के फैसले के ठीक 10 साल बाद, 6 अक्टूबर 2023 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने तीनों मुख्य प्रताड़ितों की मौत की सजा को पलट दिया। हाई कोर्ट ने केवल दो दोषियों की उम्रकैद बरकरार रखी और बाकी चार को बरी कर दिया। इस फैसले ने पीड़िता के परिवार और पूरे कामदुनी गांव को तोड़कर रख दिया था। लेकिन हार न मानते हुए गांव की महिलाओं और स्थानीय लोगों ने धमकियों की परवाह किए बिना सड़कों पर उतरकर न्याय की लड़ाई जारी रखी।

‘जांच रिपोर्ट ऐसी बनाई कि जज के पास बरी करने के अलावा रास्ता नहीं था’

सोमवार को इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए बंगाल भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने तत्कालीन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा, ‘पश्चिम बंगाल की जनता चाहती है कि कामदुनी की फाइलें दोबारा खोली जाएं। इस केस की पुरानी जांच रिपोर्ट को जानबूझकर इस तरह से कमजोर तैयार किया गया था कि माननीय जज के पास आरोपियों को तकनीकी आधार पर बरी करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता ही न बचे।’ आपको बता दें कि आंदोलन के दिनों में भी एक्टिविस्ट टुम्पा कयाल ने शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की थी, जो उस समय विपक्ष के नेता थे, और तब शुभेंदु अधिकारी ने सरकार में आने पर न्याय का पूरा भरोसा दिया था। अब जब वे खुद सूबे के मुख्यमंत्री हैं, तो कामदुनी के लोगों को न्याय की एक नई किरण दिखाई दे रही है।