देव आनंद की अनसुनी कहानी: जब अंग्रेजों के दफ्तर में 165 रुपये की नौकरी करते थे देव साहब

अपनी मस्तानी चाल, खुली कॉलर की कमीज, अनोखे हाव-भाव और सिर पर सजी टेढ़ी टोपी… ये कुछ ऐसी खूबियां थीं जिसने पूरे हिंदुस्तान को देव आनंद (Dev Anand) का दीवाना बना दिया था। हिंदी सिनेमा के इतिहास में उन्हें एक ऐसे ‘एवरग्रीन’ (सदाबहार) सुपरस्टार के रूप में याद किया जाता है, जिनकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ी।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि रुपहले पर्दे पर रोमांस का जादू बिखेरने से पहले देव साहब ने पेट पालने के लिए अंग्रेजों के अधीन एक बहुत ही अजीब नौकरी की थी? आइए जानते हैं देव आनंद के संघर्ष और उनके सुपरस्टार बनने की वह दिलचस्प कहानी, जो किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है।

जब पेट पालने के लिए सेंसर ऑफिस में कटी रातें

बात उन दिनों की है जब देव आनंद मुंबई (तब बॉम्बे) में नए-नए आए थे और अभिनेता बनने का सपना लिए हर रोज प्रोडक्शन हाउस और निर्देशकों के दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे। जेब खाली थी और मुंबई जैसे शहर में पेट पालना आसान नहीं था। इसी संघर्ष के बीच उन्हें ब्रिटिश आर्मी के सेंसर ऑफिस (Censor Office) में एक क्लर्क की नौकरी मिल गई।

क्या था देव आनंद का ‘अजीब’ काम?

ब्रिटिश सेना के इस दफ्तर में देव आनंद का काम बड़ा ही दिलचस्प और अजीब था। उन्हें ब्रिटिश सेना के अधिकारियों और सैनिकों द्वारा अपने परिवार या करीबियों को लिखे गए खतों (Letters) को पोस्ट होने से पहले पढ़ना होता था। ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि कोई भी सैनिक गलती से भी सेना की कोई गोपनीय या रणनीतिक जानकारी बाहर न भेज सके। इस काम के बदले देव साहब को महीने के 165 रुपये मिलते थे, जो उस जमाने में एक ठीक-ठाक रकम थी।

एक ब्रिटिश अफसर के ‘काश’ ने बदल दी दुनिया

नौकरी ठीक चल रही थी और देव साहब का गुजारा आराम से हो रहा था, लेकिन उनके भीतर का कलाकार इस बात से खुश नहीं था। वह हर रोज खुद से सवाल करते थे कि क्या वे इसी काम के लिए बने हैं? वे नौकरी छोड़ना चाहते थे, लेकिन आगे का भविष्य धुंधला था।

तभी एक दिन उनके हाथ एक ब्रिटिश ऑफिसर का लिखा खत लगा। उस अफसर ने अपनी प्रेमिका/पत्नी को याद करते हुए लिखा था:

“काश! मैं अभी ये नौकरी छोड़ सकता… तो सीधे तुम्हारे पास आता और तुम्हारी बाहों में होता।”

इस एक शब्द ‘काश’ ने देव आनंद के दिल पर सीधा असर किया। उन्होंने सोचा कि वह अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर पहुंचकर यह कभी नहीं सोचना चाहते कि ‘काश, मैंने वह 165 रुपये की नौकरी छोड़कर एक्टर बनने की कोशिश की होती!’ इस खत ने उन्हें वो हिम्मत दी जिसकी उन्हें तलाश थी। उन्होंने तुरंत पेन उठाया, अपना इस्तीफा लिखा और अंग्रेजों की उस नौकरी को हमेशा के लिए लात मार दी।

लोकल ट्रेन का वो अजनबी मुसाफिर और ‘प्रभात फिल्म कंपनी’

नौकरी छोड़ने के बाद देव आनंद एक बार फिर काम की तलाश में जुट गए। एक दिन जब वह मुंबई की एक लोकल ट्रेन में सफर कर रहे थे, तो उनकी मुलाकात पास बैठे एक अजनबी मुसाफिर से हुई। बातों-बातों में उस मुसाफिर ने देव साहब को बताया कि ‘प्रभात फिल्म कंपनी’ अपनी नई फिल्म के लिए एक नए, फ्रेश और खूबसूरत लड़के की तलाश कर रही है।

देव आनंद ने बिना वक्त गंवाए अगले ही दिन प्रभात फिल्म कंपनी के दफ्तर का रुख किया। वहां उनकी मुलाकात कंपनी के मालिक बाबूराव पाई से हुई। देव साहब की बेबाकी, बात करने का सलीका और उनके चेहरे का तेज देखकर बाबूराव इतने प्रभावित (Impress) हुए कि उन्होंने तुरंत उनसे कहा, “कल आकर हमारे डायरेक्टर पी.एल. संतोषी से मिलो।”

पहला कॉन्ट्रैक्ट और पहली फिल्म का सफर

1.निर्देशक पी.एल. संतोषी से भेंट:मुलाकात.

अगले दिन देव आनंद तय समय पर निर्देशक पी.एल. संतोषी के सामने हाजिर हुए। संतोषी जी देव साहब की शानदार शख्सियत और स्क्रीन प्रेजेंस के कायल हो गए।

2.3 साल का पहला कॉन्ट्रैक्ट:अनुबंध.

उन्हें देव आनंद में एक होने वाला सुपरस्टार साफ नजर आ रहा था। उन्होंने बिना कोई देरी किए देव साहब को सीधे 3 साल के कॉन्ट्रैक्ट पर साइन कर लिया।

3.पहली फिल्म ‘हम एक हैं’:डेब्यू.

इसी बैनर के तले देव आनंद की बतौर लीड हीरो पहली फिल्म ‘हम एक हैं’ बनकर तैयार हुई और सिनेमाघरों में रिलीज हुई।

4.बॉक्स ऑफिस पर औसत, किस्मत में सुपरहिट:नतीजा.

यद्यपि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित नहीं हो सकी, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री और दर्शकों ने देव आनंद के अभिनय और उनके अनोखे अंदाज को भांप लिया। यहीं से उनके उस सफर की शुरुआत हुई जिसने आगे चलकर उन्हें भारतीय सिनेमा का ‘सदाबहार महानायक’ बना दिया।