Middle East Crisis: वॉशिंगटन में होने वाली इजरायल-लेबनान बैठक से ठीक पहले परमाणु मुद्दे पर क्यों पीछे हटा ईरान?

पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी भारी तनाव और अमेरिका के साथ चल रहे सैन्य टकराव के बीच कूटनीतिक गलियारों से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के प्रमुख राफेल ग्रॉसी ने दावा किया है कि चौतरफा दबाव का सामना कर रहे ईरान ने अपने कई प्रमुख परमाणु कार्यक्रमों को बंद या बेहद सीमित कर दिया है।

यह दावा वैश्विक सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि पिछले कुछ समय से खाड़ी क्षेत्र में मिसाइल हमलों और नाकेबंदी के कारण युद्ध का खतरा चरम पर पहुंच चुका था।

पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों का दिखने लगा असर

राफेल ग्रॉसी के मुताबिक, पश्चिमी देशों द्वारा ईरान पर लगाए गए सख्त आर्थिक और रणनीतिक प्रतिबंधों का असर अब जमीनी स्तर पर दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय खुफिया जानकारियों और सैटेलाइट डेटा से यह साफ हुआ है कि ईरान ने अपने परमाणु अभियानों की रफ्तार को काफी हद तक धीमा कर दिया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान से ‘लिखित न्यूक्लियर गारंटी’ मांगने की खबरों के बीच इस खुलासे को तेहरान के एक रक्षात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक तंगी और अंतरराष्ट्रीय अलगाव से बचने के लिए ईरान को न चाहते हुए भी यह फैसला लेना पड़ा है।

वॉशिंगटन में इजरायल और लेबनान के बीच चौथे दौर की बैठक

यह बड़ा बयान एक ऐसे समय पर आया है जब मिडिल ईस्ट में शांति बहाली की कोशिशों को लेकर कूटनीतिक हलचलें अचानक तेज हो गई हैं। इजरायल और लेबनान के बीच चल रहे सीमा विवाद और सैन्य संघर्ष को रोकने के लिए अमेरिका की मध्यस्थता में चौथे दौर की शांति वार्ता होने जा रही है।

मौजूदा कूटनीतिक स्थिति को आप नीचे दी गई तालिका से आसानी से समझ सकते हैं:

 शांति वार्ता पर टिकी पूरी दुनिया की नजरें

इस बेहद महत्वपूर्ण बैठक का हिस्सा बनने के लिए इजरायल और लेबनान दोनों ही देशों के शीर्ष राजनयिक और सैन्य प्रतिनिधि वॉशिंगटन पहुंच चुके हैं। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ईरान सच में अपने परमाणु कदम पीछे खींचता है, तो इससे खाड़ी क्षेत्र में जारी मिसाइल हमलों को रोकने और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तेल की सप्लाई को सामान्य करने में बड़ी मदद मिल सकती है। हालांकि, अमेरिका और उसके मित्र देश अब भी तेहरान के किसी भी मौखिक आश्वासन के बजाय जमीनी स्तर पर पक्के और लिखित समझौतों की मांग पर अड़े हुए हैं।