डॉलर के सामने भले ही टूटे, पर नेपाल में आज भी राजा है भारतीय रुपया; जानें दोनों करेंसी का दिलचस्प कनेक्शन

वैश्विक बाजार के उथल-पुथल भरे समीकरणों के बीच भारतीय रुपया इन दिनों अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार भारी दबाव का सामना कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की आसमान छूती कीमतों, पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी गंभीर भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक बाजारों में डॉलर की चौतरफा मजबूती के चलते घरेलू करेंसी रिकॉर्ड गिरावट देख रही है। बुधवार (20 मई) को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले लुढ़ककर अपने सर्वकालिक निचले स्तर 96.59 के करीब पहुंच गया।

हालांकि, डॉलर के मोर्चे पर मिल रही इस तगड़ी चुनौती के बावजूद पड़ोसी देश नेपाल की करेंसी के सामने भारतीय रुपये (INR) का सिक्का और दबदबा आज भी पहले की तरह मजबूत बना हुआ है।

भारतीय और नेपाली रुपये में कितना है फर्क?

ताजा विदेशी मुद्रा विनिमय दरों (Exchange Rates) के मुताबिक, भारतीय रुपया नेपाली करेंसी (NPR) के मुकाबले काफी बेहतर स्थिति में है:

  • 1 भारतीय रुपया करीब 1.60 नेपाली रुपये के बराबर बैठता है।

  • वहीं, 1 नेपाली रुपया भारतीय करेंसी के हिसाब से करीब 62 पैसे का होता है।

  • अगर इसे और भी आसान और व्यावहारिक भाषा में समझें, तो यदि आप भारत के 100 रुपये लेकर नेपाल जाते हैं, तो वहां उसकी क्रय शक्ति करीब 160 नेपाली रुपये के बराबर मानी जाती है।

राहत की बात यह है कि भारतीय रुपया नेपाली करेंसी से मजबूत जरूर है, लेकिन हमारे अन्य पड़ोसी देश पाकिस्तान जैसी बदतर स्थिति यहाँ नहीं है, जहाँ करेंसी का अंतर कई गुना ज्यादा बढ़ चुका है। इसकी मुख्य वजह दोनों देशों का एक अनूठा और कूटस्थ आर्थिक समझौता है।

आखिर भारत की चाल पर क्यों चलती है नेपाल की करेंसी?

नेपाल की मुद्रा पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से फ्लोट (उतार-चढ़ाव) नहीं करती है, बल्कि वह भारतीय रुपये के साथ एक फिक्स्ड एक्सचेंज रेट (स्थिर विनिमय दर) के तहत कूटनीतिक रूप से जुड़ी (Pegged) हुई है। दशकों से 1 भारतीय रुपये की कीमत 1.60 नेपाली रुपये पर बिल्कुल स्थिर लॉक की गई है। यही वजह है कि जब भी अंतरराष्ट्रीय कारणों से भारतीय रुपये की सेहत सुधरती या बिगड़ती है, तो नेपाली रुपया भी उसी अनुपात में मजबूत या कमजोर होता है।

निर्भरता का गणित: नेपाल चारों तरफ से जमीन से घिरा देश है और अपनी अर्थव्यवस्था, पर्यटन, ईंधन और रोजमर्रा के लगभग हर छोटे-बड़े सामान के आयात के लिए पूरी तरह भारत पर निर्भर है। नेपाल अपनी जरूरत का सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय बाजारों से ही खरीदता है। ऐसे में व्यापार में किसी भी तरह की अस्थिरता और घाटे से बचने के लिए नेपाल सरकार और वहां के केंद्रीय बैंक ने अपनी करेंसी को भारतीय रुपये से लिंक रखने की बेहद समझदारी भरी नीति अपनाई है।

नासिक प्रेस से चीन तक: नोटों की छपाई का दिलचस्प इतिहास

भारत और नेपाल के रिश्ते सिर्फ व्यापारिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक भी हैं। बेहद दिलचस्प बात यह है कि नेपाल की शुरुआती करेंसी की छपाई खुद भारत में ही होती थी। जब नेपाल का केंद्रीय बैंक यानी ‘नेपाल राष्ट्र बैंक’ अस्तित्व में नहीं आया था और उसके शुरुआती संचालन के दिनों में, नेपाली नोट भारत के नासिक स्थित ‘इंडिया सिक्योरिटी प्रेस’ में ही छापे जाते थे।

साल 2015 तक नेपाल अपनी करेंसी की छपाई के लिए काफी हद तक भारतीय प्रिंटिंग प्रेसों पर ही निर्भर रहा। हालांकि, इसके बाद के वर्षों में तकनीकी और व्यावसायिक टेंडर्स के चलते नेपाल ने चीन की सरकारी कंपनियों से अपने नोट छपवाना शुरू कर दिया, लेकिन इसके बावजूद उसकी वैल्यू का आधार आज भी भारतीय रुपया ही है।

नेपाल के बाजारों में धड़ल्ले से चलता है भारतीय रुपया

दोनों देशों के बीच खुली सीमा (Open Border) और गहरे पारिवारिक व आर्थिक संबंधों के कारण नेपाल के आम बाजारों, खासकर सीमावर्ती इलाकों में भारतीय नोटों का इस्तेमाल बेहद आम बात है। नेपाल के प्रमुख पर्यटन स्थलों, होटलों, ट्रांसपोर्ट और स्थानीय दुकानों पर भारतीय रुपये को बेहद भरोसेमंद माना जाता है और इसे आसानी से स्वीकार कर लिया जाता है। हर दिन हजारों लोग पढ़ाई, इलाज, रोजगार और धार्मिक यात्रा के लिए दोनों देशों के बीच बेरोकटोक आवाजाही करते हैं, जिससे भारतीय रुपया वहां की रोजमर्रा की जिंदगी का एक अटूट हिस्सा बन चुका है।

भारत के लिए असली चिंता क्या है?

भले ही नेपाल में भारतीय रुपया मजबूत हो, लेकिन भारत के नीति निर्माताओं और रिजर्व बैंक (RBI) के लिए असली चिंता डॉलर के मुकाबले इसकी लगातार गिरती साख है। भारत अपनी कुल जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल दूसरे देशों से आयात करता है, जिसका भुगतान डॉलर में करना होता है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, भारत का फॉरेक्स रिजर्व (विदेशी मुद्रा भंडार) तेजी से घटता है और डॉलर की डिमांड बढ़ने से रुपये पर दबाव आता है। फिलहाल बाजार के जानकारों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में केंद्रीय बैंक रुपये को संभालने के लिए क्या कदम उठाता है।