घूंघट के बदले शेरवानी की शर्त: गाजियाबाद में परंपरा और निजी आजादी की अनूठी जंग, मामला पहुंचा कोर्ट

हमारे समाज में घूंघट और पर्दा प्रथा को लेकर बहस बरसों से चली आ रही है। कोई इसे संस्कृति का हिस्सा मानता है तो कोई महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन। इसी बीच उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से एक ऐसा हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जिसने इस पुरानी बहस को बिल्कुल नया और आधुनिक मोड़ दे दिया है। घूंघट को लेकर शुरू हुआ एक घरेलू विवाद अब परिवार परामर्श केंद्र की चौखट को पार कर सीधे अदालत (Court) के गलियारों में पहुंच गया है, और नौबत शादी के कुछ ही दिन बाद तलाक (Divorce) तक आ गई है।

शादी के दो दिन बाद ही शुरू हुआ विवाद

मिली जानकारी के अनुसार, गाजियाबाद के भोजपुर क्षेत्र की रहने वाली एक पढ़ी-लिखी युवती की शादी करीब एक साल पहले राजस्थान के अलवर निवासी एक युवक से हुई थी। शादी के बाद जब दुल्हन अपने ससुराल पहुंची, तो उम्मीद के मुताबिक उससे घूंघट करने की अपेक्षा की गई। राजस्थान के कई हिस्सों में आज भी यह परंपरा काफी कड़ाई से मानी जाती है।

विवाहिता का आरोप है कि ससुराल पहुंचते ही उस पर पारंपरिक तौर-तरीकों को मानने और लगातार घूंघट में रहने का मानसिक दबाव बनाया जाने लगा। महिला ने इस बात का कड़ा विरोध किया और साफ कहा कि घूंघट करना या न करना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Freedom) का मामला है, इसे जबरन किसी पर थोपा नहीं जा सकता। इसी बात को लेकर पति-पत्नी और ससुराल पक्ष के बीच तकरार बढ़ती गई।

“तुम घूंघट ओढ़ो, मैं शेरवानी पहनूंगा”

जब ससुराल वाले अपनी जिद पर अड़े रहे, तो बहू ने भी विवाद को सुलझाने के बजाय एक ऐसा तर्क और शर्त सामने रख दी जिसने सबको हैरान कर दिया।

महिला की अनोखी शर्त:

“अगर ससुराल के लोगों को मुझसे हर वक्त घूंघट रखने की पारंपरिक अपेक्षा है, तो बराबरी के नियम के तहत मेरे पति को भी घर और बाहर चौबीसों घंटे सिर्फ भारी-भरकम शेरवानी पहनकर ही घूमना होगा। अगर वे ऐसा कर सकते हैं, तो मैं भी घूंघट के नियम को मान लूंगी।”

पत्नी की इस अजीब और तीखी शर्त के बाद बात बनने की बजाय पूरी तरह बिगड़ गई। दोनों पक्षों के बीच रिश्तेदारों ने कई बार बातचीत की कोशिश की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

काउंसलिंग भी फेल, जोड़ों में बढ़ रहे वैचारिक मतभेद

मामले को सुलझाने के लिए इसे गाजियाबाद के परिवार परामर्श केंद्र भेजा गया था। वहां के काउंसलर्स ने पति-पत्नी और उनके परिवारों को एक साथ बिठाकर कई दौर की काउंसलिंग की। दोनों पक्षों का रुख कुछ इस प्रकार था:

काउंसलर्स के मुताबिक, लाख समझाने के बाद भी दोनों में से कोई भी पक्ष अपने रुख से टस से मस होने को तैयार नहीं हुआ। आखिरकार, कोई समझौता न होते देख परामर्श केंद्र ने इस केस की फाइल बंद कर दी। अब दोनों पक्षों ने अदालत में आधिकारिक तौर पर तलाक की अर्जी दाखिल कर दी है।

आधुनिक शादियों में लाइफस्टाइल बन रही है बड़ी अड़चन

परिवार परामर्श केंद्र के विशेषज्ञों का कहना है कि इन दिनों नए शादीशुदा जोड़ों के बीच सिर्फ गंभीर मुद्दे ही नहीं, बल्कि वैचारिक मतभेद, रहन-सहन, खान-पान और आधुनिक जीवनशैली को लेकर भी विवाद तेजी से बढ़ रहे हैं।

अकेले गाजियाबाद में ही ऐसे कई मामले देखने को मिले हैं जहां विवाद की जड़ें बहुत छोटी थीं:

  • कपड़ों पर पाबंदी: एक मामले में एक नवविवाहिता ने सिर्फ इसलिए शिकायत दर्ज करा दी क्योंकि उसे शादी के बाद वेस्टर्न (पश्चिमी) कपड़े पहनने से रोककर हर वक्त साड़ी पहनने को मजबूर किया जा रहा था।

  • सोशल मीडिया और रील्स का चस्का: एक अन्य मामले में पति ने अपनी पत्नी पर यह आरोप लगाते हुए अलग होने की अर्जी दे दी कि उसकी पत्नी दिनभर मोबाइल पर व्यस्त रहती है और घर के काम छोड़कर सिर्फ सोशल मीडिया के लिए रील्स (Reels) बनाती रहती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आज की पीढ़ी रिश्तों में आपसी तालमेल और ‘कॉम्प्रोमाइज’ करने के मूड में बिल्कुल नहीं दिखती, जिससे निजी स्वतंत्रता की बात बहुत जल्दी अदालतों तक पहुंच रही है।