
भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास बने धार्मिक ढांचों को लेकर राजस्थान हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने सीमा से 50 किलोमीटर के दायरे में स्थित मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों को जारी किए गए बेदखली और कारण बताओ नोटिस के खिलाफ दायर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है। हाई कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक आदेश में स्पष्ट किया कि देश की सीमाओं पर राष्ट्रीय सुरक्षा और जनहित सबसे बड़ी प्राथमिकता है, जिससे किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता।
आखिर किस कानून के तहत हो रही है यह बड़ी कार्रवाई?
इस फैसले के बाद देश भर में यह कानूनी सवाल चर्चा में है कि आखिर किस नियम के आधार पर प्रशासन सीमाई इलाकों में यह कड़ा कदम उठा रहा है। राजस्थान हाई कोर्ट ने अपने फैसले में केंद्रीय गृह मंत्रालय की 11 अक्टूबर 2021 की अधिसूचना और सीमा सुरक्षा बल (BSF) अधिनियम, 1968 की धारा 139 का विशेष रूप से उल्लेख किया है। इसी कानूनी ढांचे के तहत केंद्र सरकार ने सीमा पर बदलते सुरक्षा हालात, घुसपैठ, तस्करी और देश विरोधी गतिविधियों को रोकने के लिए बीएसएफ के परिचालन और अधिकार क्षेत्र को 50 किलोमीटर तक बढ़ाया था। कोर्ट ने इसे एक सोच-समझकर लिया गया नीतिगत फैसला माना है।
50 किलोमीटर का सुरक्षा दायरा क्यों है इतना संवेदनशील?
अदालत ने माना कि भारत-पाकिस्तान सीमा से लगा 50 किलोमीटर तक का इलाका सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह का अनधिकृत (Illegal) निर्माण या संदिग्ध गतिविधि देश की सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चिंता का विषय बन सकती है। कोर्ट ने साफ कहा कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पर होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई को जमीन के किसी सामान्य राजस्व विवाद की तरह नहीं देखा जा सकता। इसका एकमात्र उद्देश्य राष्ट्र की सुरक्षा व्यवस्था को अभेद्य बनाना है।
राज्य सरकार ने कोर्ट में खोली बिना मंजूरी के निर्माण की पोल
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत के सामने पुख्ता दलीलें पेश कीं। सरकार ने बताया कि संबंधित मस्जिदें, मदरसे और दरगाहें बिना किसी वैध सरकारी अनुमति, स्वीकृति या भूमि उपयोग परिवर्तन (Land Use Change) के बनाई गई हैं। सरकारी रिकॉर्ड, जन शिकायतों और खुफिया एजेंसियों (Intelligence Inputs) से मिले इनपुट के आधार पर इन अनधिकृत ढांचों का बॉर्डर एरिया में संचालित होना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई कानून के दायरे में है और किसी धर्म विशेष के खिलाफ बिल्कुल नहीं है।
सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश नाकाम, कोर्ट ने ठुकराई भेदभाव की दलील
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दावा किया था कि प्रशासन केवल एक विशेष समुदाय के धार्मिक स्थलों को निशाना बना रहा है। इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी तथ्य मौजूद नहीं है जो इसे साबित करे। कोर्ट ने अपने आदेश में सख्त लहजे में लिखा कि संवेदनशील सीमा क्षेत्र में जहां भी अवैध निर्माण पाए गए, वहां बिना किसी भेदभाव के नोटिस दिए गए हैं। इसलिए इस राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले को सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास पूरी तरह गलत और तथ्यों से परे है।
याचिकाओं में थीं गंभीर कानूनी कमियां और दस्तावेजों का अभाव
हाई कोर्ट ने जांच में पाया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर की गई अर्जियों में बुनियादी कानूनी दस्तावेजों की भारी कमी थी। कई याचिकाएं यह भी साबित नहीं कर सकीं कि उनका उस मस्जिद या मदरसे से कोई वैध कानूनी संबंध है। किसी भी रजिस्टर्ड संस्था का प्रस्ताव या अधिकार पत्र रिकॉर्ड पर नहीं था। इसके अतिरिक्त, इन ढांचों के निर्माण के लिए ‘धार्मिक भवन अधिनियम’ की धारा 5 और 6 के तहत जरूरी वैधानिक अनुमतियां भी नहीं ली गई थीं, जिससे प्रथम दृष्टया ये निर्माण पूरी तरह गैर-कानूनी साबित हुए।
सुप्रीम कोर्ट के ‘बुलडोजर फैसले’ का हवाला क्यों हुआ खारिज?
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया फैसले की दलील दी थी जिसमें बुलडोजर कार्रवाई को लेकर कड़े दिशा-निर्देश जारी किए गए थे। हालांकि, राजस्थान हाई कोर्ट ने इस तुलना को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला अपराधियों और आरोपियों की निजी संपत्तियों पर होने वाली दंडात्मक कार्रवाई से जुड़ा था। उसकी तुलना भारत-पाकिस्तान सीमा जैसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र और देश की संप्रभुता से जुड़े इस मामले से बिल्कुल नहीं की जा सकती।
राष्ट्रीय सुरक्षा में ‘प्राकृतिक न्याय’ के नियम हमेशा एक जैसे नहीं होते
एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि जब बात देश की सुरक्षा की हो, तो हर परिस्थिति में पारंपरिक प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के नियमों का लकीर के फकीर की तरह पालन जरूरी नहीं होता। यदि प्रशासन के पास राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पुख्ता इनपुट और उचित आधार हैं, तो व्यावहारिक और सख्त तरीका अपनाया जा सकता है। कोर्ट ने माना कि इस मामले में प्रशासनिक प्रक्रियाओं का सही पालन हुआ है और याचिकाकर्ताओं के अधिकारों का कोई गंभीर हनन नहीं हुआ है।
अब आगे क्या होगा? कोर्ट ने बनाया एक्शन प्लान
याचिकाएं खारिज करने के साथ ही हाई कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया है कि किसी के साथ अन्याय न हो। अदालत ने निर्देश दिया है कि संबंधित सीमावर्ती जिलों के जिला कलेक्टर (DM), पुलिस अधीक्षक (SP) और सीमा सुरक्षा बल (BSF) के प्रतिनिधियों की एक संयुक्त समिति बनाई जाए। यह विशेष समिति हर एक विवादित संपत्ति का व्यक्तिगत और जमीनी स्तर पर बारीकी से परीक्षण करेगी, जिसके बाद ही कानून के मुताबिक बेदखली या आगे की उचित कार्रवाई की जाएगी।
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