भोजशाला केस पहुंचा सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के मंदिर वाले फैसले को काजी ने दी चुनौती

मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक और बेहद संवेदनशील भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर मामले में एक बार फिर कानूनी जंग देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ द्वारा भोजशाला को ‘मां सरस्वती का मंदिर’ घोषित किए जाने के फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्ष ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है। काजी मोइनुद्दीन ने हाईकोर्ट के इस ऐतिहासिक आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की है। एक तरफ जहां यह मामला सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर है, वहीं दूसरी तरफ आज धार में एक नया इतिहास रचने जा रहा है।

721 वर्षों का इंतजार खत्म, पहली बार शुक्रवार को होगी मां वाग्देवी की महाआरती

सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई इस याचिका से इतर, जमीनी स्तर पर भोजशाला परिसर में आज का दिन बेहद ऐतिहासिक है। करीब 721 वर्षों के लंबे संघर्ष और कानूनी दांव-पेंच के बाद यह पहला मौका है, जब शुक्रवार के दिन भोजशाला परिसर में मां वाग्देवी (सरस्वती) की भव्य महाआरती और विशेष पूजन का आयोजन किया जा रहा है।

आमतौर पर शुक्रवार का दिन यहां मुस्लिम पक्ष की नमाज के लिए आरक्षित रहता था, लेकिन अब इस परिसर में मां वाग्देवी के जयकारे गूंज रहे हैं। इस ऐतिहासिक पल को लेकर पूरे धार अंचल और आस-पास के जिलों में सनातन धर्मावलंबियों के बीच दिवाली और उत्सव जैसा माहौल देखा जा रहा है।

हाईकोर्ट ने पलटा था साल 2003 का आदेश, नमाज पर लगाई थी रोक

इससे पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने अपने फैसले में एक बड़ा कदम उठाया था। कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के 7 अप्रैल 2003 के उस पुराने आदेश को पूरी तरह रद्द (Cancel) कर दिया था, जिसके तहत मुस्लिम पक्ष को हर शुक्रवार को परिसर के अंदर नमाज अदा करने की विशेष अनुमति मिली हुई थी।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा था कि विवादित क्षेत्र एक संरक्षित स्मारक है और इसका मूल धार्मिक स्वरूप एक मंदिर का ही है। इसके साथ ही अदालत ने टिप्पणी की थी कि मुस्लिम पक्ष चाहे तो अपनी नमाज और मस्जिद निर्माण के लिए राज्य सरकार से किसी वैकल्पिक (Alternative) भूमि की मांग कर सकता है।

अयोध्या फैसले के सिद्धांतों पर आधारित है हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में स्पष्ट किया था कि ऐतिहासिक दस्तावेज, विदेशी यात्रियों के वृत्तांत और पुरातात्विक साक्ष्य (Archaeological Evidence) अकाट्य रूप से यह साबित करते हैं कि यह स्थल प्राचीन काल में संस्कृत शिक्षा का एक महान केंद्र (धार की प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी) था और यहां राजा भोज द्वारा स्थापित मां सरस्वती का भव्य मंदिर मौजूद था।

अदालत ने कहा कि उसने इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘अयोध्या राम जन्मभूमि फैसले’ में तय किए गए कानूनी सिद्धांतों और साक्ष्यों के मूल्यांकन के तरीकों को आधार बनाया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और एएसआई को मंदिर के प्रशासनिक प्रबंधन पर अंतिम निर्णय लेने का निर्देश दिया था, हालांकि सुरक्षा और रख-रखाव की जिम्मेदारी फिलहाल एएसआई के पास ही रहेगी।

लंदन से वापस लाई जाएगी मां सरस्वती की असली प्रतिमा?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में हिंदू पक्ष की उस भावुक और बेहद महत्वपूर्ण मांग पर भी सकारात्मक रुख दिखाया था, जिसमें ब्रिटिश शासनकाल के दौरान भारत से लंदन ले जाई गई मां सरस्वती (वाग्देवी) की मूल प्रतिमा को वापस स्वदेश लाने की गुहार लगाई गई थी। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह इस मांग को एक गंभीर प्रतिनिधित्व (Representation) के रूप में स्वीकार करे और अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत लंदन से मूर्ति वापस लाने के प्रयासों पर विचार करे।

ASI सर्वे की रिपोर्ट ने बदल दिया पूरा केस

आपको बता दें कि साल 2024 में हाईकोर्ट के ही आदेश पर एएसआई (ASI) ने आधुनिक तकनीकों, जैसे जीपीआर सर्वे और कार्बन डेटिंग के जरिए भोजशाला परिसर का एक बेहद विस्तृत वैज्ञानिक सर्वे किया था। एएसआई ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा था कि वर्तमान में जो ढांचा (मस्जिद स्वरूप) खड़ा है, वह दरअसल पुराने हिंदू मंदिरों के स्तंभों, नक्काशीदार पत्थरों और अवशेषों को तोड़कर या उन्हीं के हिस्सों का इस्तेमाल करके निर्मित किया गया प्रतीत होता है। इस रिपोर्ट और जजों द्वारा खुद स्थल का बारीकी से निरीक्षण करने के बाद ही हाईकोर्ट ने हिंदुओं के पक्ष में यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।