
पड़ोसी देश बांग्लादेश ने अपने जल संकट को दूर करने और कृषि क्षेत्र को नया जीवन देने के नाम पर एक ऐसा बड़ा कदम उठाया है, जिसने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति (Geopolitics) में हलचल तेज कर दी है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के चेयरमैन तारिक रहमान ने साफ कर दिया है कि उनकी सरकार देश के दो सबसे बड़े और बहुप्रतीक्षित जल प्रोजेक्ट्स— पद्मा बैराज और तीस्ता बैराज (Teesta Barrage Project) पर बेहद जल्द जमीनी काम शुरू करने जा रही है।
यह बेहद महत्वपूर्ण ऐलान ऐसे रणनीतिक मोड़ पर हुआ है, जब प्रधानमंत्री रहमान जल्द ही चीन के आधिकारिक दौरे पर जाने वाले हैं। उनके इस दौरे से ठीक पहले तीस्ता प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के फैसले से यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि इस पूरे मेगा प्रोजेक्ट में अब चीन की अरबों डॉलर की भारी-भरकम आर्थिक और तकनीकी भूमिका होने जा रही है।
गाजीपुर की रैली से हुंकार: पीएम रहमान बोले- तीस्ता पर जमीन बीएनपी ने ही तैयार की
बुधवार दोपहर ढाका के समीप गाजीपुर में ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान’ की नई इमारत का शिलान्यास करने के बाद एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने इस प्रोजेक्ट का पूरा क्रेडिट अपनी पार्टी को दिया। उन्होंने जोर देकर कहा, “मैं देश की जनता के सामने यह पूरी तरह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि यह बीएनपी सरकार ही है जो पद्मा बैराज और तीस्ता बैराज दोनों का निर्माण कार्य शुरू करेगी। पूर्व में बीएनपी ने तीस्ता जल मुद्दे को लेकर जमीनी स्तर पर कई बड़े आंदोलन और कार्यक्रम चलाए हैं। इसलिए, अगर किसी ने इस दिशा में वास्तव में ईमानदारी से काम किया है और जमीन तैयार की है, तो वह बीएनपी ही है।”
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, बांग्लादेश सरकार देश के उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों की सिंचाई व्यवस्था को सुधारने के लिए राजशाही में पद्मा नदी पर बैराज बनाने की मंजूरी पहले ही दे चुकी थी, और अब प्रधानमंत्री ने तीस्ता बैराज को भी आधिकारिक रूप से ग्रीन सिग्नल दे दिया है।
जून के अंत में चीन दौरा: 1 अरब डॉलर के मेगा प्रोजेक्ट पर लग सकती है मुहर
तीस्ता बैराज को लेकर किए गए इस औचक ऐलान के पीछे एक सोची-समझी कूटनीति मानी जा रही है। जून के अंत में प्रधानमंत्री तारिक रहमान बीजिंग की यात्रा पर जाने वाले हैं। कूटनीतिक हलकों में यह प्रबल उम्मीद जताई जा रही है कि उनकी इस चीनी यात्रा के दौरान तीस्ता बैराज सहित कई अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं (Infrastructure Projects) की फंडिंग और लोन एग्रीमेंट को लेकर चीन के साथ अंतिम दौर की बातचीत होगी।
ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने इसी महीने (मई 2026) बीजिंग में अपने चीनी समकक्ष वांग यी से मुलाकात कर इस करीब 1 अरब डॉलर के मेगा प्रोजेक्ट के लिए औपचारिक रूप से वित्तीय मदद की मांग की है, जिसे अब पीएम के दौरे में अंतिम रूप दिया जा सकता है।
फरक्का बैराज पर साधा निशाना: सुंदरबन में खारापन बढ़ने का दावा
देश में गहराते जल संकट का रोना रोते हुए बांग्लादेशी पीएम ने सीधे तौर पर सीमाओं के पार (भारत की तरफ) बन रहे बांधों और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को मोड़े जाने की तरफ इशारा किया। उन्होंने दावा किया कि सूखे के मौसम में बांग्लादेश को अंतरराष्ट्रीय नदियों से उनका उचित हिस्सा और पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता है।
रहमान ने भारत के फरक्का बैराज (Farakka Barrage) का विशेष रूप से जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि इसकी वजह से बांग्लादेश के दक्षिणी भूभाग में समुद्र का खारा पानी (Salinity) तेजी से अंदर घुस रहा है। इसका सबसे विनाशकारी असर दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रोव जंगल ‘सुंदरबन’ सहित कई तटीय इलाकों के पर्यावरण पर पड़ रहा है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा, “मिट्टी और पानी में खारापन बढ़ने से सुंदरबन के कई दुर्लभ पेड़-पौधे नष्ट हो रहे हैं और बेशकीमती जानवर विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं। हमें अपने यहां इन बैराजों का निर्माण हर हाल में करना होगा ताकि मानसून के दौरान मिलने वाले अतिरिक्त पानी को स्टोर करके हम उसे सूखे के मौसम में अपने किसानों और आम लोगों को समय पर उपलब्ध करा सकें।”
भारत-बांग्लादेश जल विवाद: इतिहास और अटका हुआ तीस्ता समझौता
भारत और बांग्लादेश के बीच 54 साझा नदियां हैं, जिनके पानी के बंटवारे को लेकर लंबे समय से कूटनीतिक असहमति रही है। हालांकि, साल 1996 में दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक ‘गंगा जल बंटवारा संधि’ (Ganga Water Treaty) हुई थी, जिसकी 30 साल की मियाद इसी साल दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है। अधिकारियों के मुताबिक, इस बेहद महत्वपूर्ण समझौते को आगे रिन्यू (नवीनीकृत) करने के लिए दोनों देशों के उच्चायोगों और जल संसाधन मंत्रालयों के बीच फिलहाल बातचीत के दौर चल रहे हैं।
दूसरी तरफ, तीस्ता नदी के जल बंटवारे का पेंच पिछले डेढ़ दशक से फंसा हुआ है। केंद्र सरकार के स्तर पर दोनों देश इस समझौते के मसौदे पर सहमत तो हो गए थे, लेकिन भारत की आंतरिक राजनीति और पश्चिम बंगाल सरकार के कड़े रुख के चलते इस पर अब तक हस्ताक्षर नहीं हो सके हैं। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह तर्क देते हुए इस समझौते का पुरजोर विरोध किया था कि तीस्ता में पानी का स्तर पहले से ही कम है और बांग्लादेश को ज्यादा पानी देने से उत्तर बंगाल के जिलों में खेती और पीने के पानी का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।
चीन की एंट्री और रहमान का ऐलान: भारत के लिए क्यों बढ़ा ‘रेड फ्लैग’?
बांग्लादेश की नई सरकार द्वारा तीस्ता बैराज प्रोजेक्ट के निर्माण में चीन को सीधे तौर पर शामिल करने की तैयारी ने नई दिल्ली के रणनीतिक और सैन्य गलियारों में गहरी चिंताएं पैदा कर दी हैं। भारत के लिए यह महज एक नदी जल प्रबंधन या सिंचाई की परियोजना नहीं है, बल्कि देश की राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और कूटनीतिक प्रभाव से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मामला है। भारत की सुरक्षा और कूटनीति पर इसके होने वाले सीधे असर को इन तीन मुख्य बिंदुओं में आसानी से समझा जा सकता है:
1. ‘चिकन नेक’ (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) की सुरक्षा पर सीधा खतरा
भारत की सबसे बड़ी और गैर-समझौतावादी चिंता देश की सैन्य सुरक्षा को लेकर है। तीस्ता नदी का जो हिस्सा बांग्लादेश में आता है, वह भारत के रणनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ (Siliguri Corridor) यानी जिसे ‘चिकन नेक’ कहा जाता है, उससे महज कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह केवल 20 किलोमीटर चौड़ा एक संकरा जमीनी रास्ता है, जो पूरे पूर्वोत्तर भारत (North-East States) को शेष भारत के साथ भौगोलिक रूप से जोड़ता है। इस प्रोजेक्ट के बहाने नदी प्रबंधन, गाद निकालने (Dredging) और हैवी इंजीनियरिंग के नाम पर चीन की सरकारी कंपनियों (जैसे- पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन ऑफ चाइना) और चीनी सेना (PLA) से जुड़े इंजीनियरों व तकनीकी विशेषज्ञों की इस इलाके में स्थाई मौजूदगी भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बहुत बड़ा ‘रेड फ्लैग’ और परमानेंट सिरदर्द बन जाएगी।
2. कूटनीतिक मोर्चे पर भारत के लिए बड़ा झटका
बांग्लादेश का यह कदम भारत की क्षेत्रीय जल कूटनीति (Water Diplomacy) के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान, भारत ने इस चीनी खतरे को भांपते हुए खुद इस तीस्ता प्रोजेक्ट में तकनीकी और आर्थिक मदद की पेशकश की थी ताकि चीन को अपनी सीमाओं से दूर रखा जा सके। लेकिन अब बांग्लादेश में हुए तख्तापलट और बीएनपी (BNP) की नई सरकार के सत्ता में आने के बाद, ढाका का झुकाव नई दिल्ली के बजाय खुलकर बीजिंग की तरफ हो गया है। इससे यह वैश्विक संदेश भी जाता है कि यदि भारत अपनी आंतरिक और क्षेत्रीय राजनीति के कारण पड़ोसियों के साथ समय पर द्विपक्षीय समझौते नहीं कर पाता है, तो पड़ोसी देश संकोच छोड़कर भारत के घोर विरोधी देशों (चीन) के रणनीतिक जाल में फंसने को तैयार हैं।
3. चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) का भारत की सीमा तक विस्तार
बांग्लादेश में हुए हालिया सत्ता परिवर्तन के बाद से ही चीन वहां अपना खोया हुआ आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव दोबारा स्थापित करने की फिराक में था। चीन ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह तीस्ता नदी परियोजना को अपनी सबसे महात्वाकांक्षी और रणनीतिक ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के तहत एक फ्लैगशिप प्रोजेक्ट के रूप में आगे बढ़ाना चाहता है। यदि चीन इस प्रोजेक्ट की पूरी फंडिंग करता है, तो बांग्लादेश के पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स ईकोसिस्टम पर बीजिंग की पकड़ और ज्यादा मजबूत हो जाएगी। यह स्थिति भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (Neighborhood First) नीति के तहत स्थापित क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा तंत्र को सीधी और खुली चुनौती देगी।
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