जल संकट के बहाने चीन से हाथ मिला रहा बांग्लादेश? पीएम तारिक रहमान के इस बड़े ऐलान से भारत की बढ़ी टेंशन

बांग्लादेश ने अपनी आंतरिक जल समस्याओं को सुलझाने और कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने के नाम पर एक ऐसा बड़ा कदम उठाने का फैसला किया है, जिसने नई दिल्ली के रणनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री और बीएनपी (BNP) के चेयरमैन तारिक रहमान ने ढाका में साफ कर दिया कि उनकी सरकार देश में बहुप्रतीक्षित पद्मा और तीस्ता बैराज प्रोजेक्ट्स पर बेहद जल्द काम शुरू करने जा रही है। यह चौंकाने वाला ऐलान ठीक ऐसे समय पर हुआ है जब प्रधानमंत्री रहमान जल्द ही चीन के एक बेहद महत्वपूर्ण आधिकारिक दौरे पर रवाना होने वाले हैं। ऐसे में इस पूरे प्रोजेक्ट में चीनी ड्रैगन की एक बड़ी आर्थिक और तकनीकी भूमिका होने की प्रबल संभावना बन गई है।

गाजीपुर की जनसभा से बांग्लादेश के पीएम ने किया बड़ा ऐलान

ढाका के नजदीकी इलाके गाजीपुर में ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान’ की नई इमारत का शिलान्यास करने के बाद एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम तारिक रहमान ने भारत को कड़ा संदेश दिया। उन्होंने बेहद आक्रामक लहजे में कहा, “मैं यह पूरी तरह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि हमारी बीएनपी सरकार पद्मा बैराज और तीस्ता बैराज दोनों का निर्माण कार्य बिना किसी देरी के शुरू करेगी। बीएनपी ने हमेशा से तीस्ता नदी के मुद्दे को लेकर देशहित में कई आंदोलन चलाए हैं। इसलिए, अगर किसी राजनीतिक दल ने इस दिशा में वास्तव में जमीन तैयार की है, तो वह सिर्फ बीएनपी ही है।” आपको बता दें कि सरकार पहले ही बांग्लादेश के उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों (विशेष रूप से राजशाही में पद्मा नदी पर) में पद्मा बैराज के निर्माण को मंजूरी दे चुकी है, और अब प्रधानमंत्री ने तीस्ता बैराज को भी आधिकारिक तौर पर हरी झंडी दिखा दी है।

आगामी चीन दौरे पर टिकी नजरें, होने जा रही है अरबों डॉलर की मेगा डील

विशेषज्ञों के मुताबिक, तीस्ता बैराज को लेकर की गई यह घोषणा पूरी तरह से सोची-समझी रणनीतिक टाइमिंग का हिस्सा है। जून 2026 के अंत में प्रधानमंत्री तारिक रहमान चीन के दौरे पर जा रहे हैं। राजनयिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, उनकी इस बीजिंग यात्रा के दौरान तीस्ता बैराज सहित कई अन्य संवेदनशील और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की फंडिंग को लेकर चीन के शीर्ष नेतृत्व के साथ बेहद विस्तार से बातचीत होगी। इस पूरे प्रोजेक्ट में चीन की तरफ से अरबों डॉलर का निवेश किए जाने का अनुमान लगाया जा रहा है।

जल संकट और भारत के फरक्का बैराज पर उगला जहर

देश के भीतर गहराते जल संकट का जिक्र करते हुए पीएम रहमान ने इसके लिए परोक्ष रूप से भारत को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि सूखे के मौसम में बांग्लादेश को उसकी नदियों में पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता है। उन्होंने सीमाओं के पार बन रहे बांधों और पानी मोड़े जाने की कड़ा आलोचना की। रहमान ने सीधे तौर पर दावा किया कि भारत के फरक्का बैराज की वजह से उनके दक्षिणी क्षेत्र में समुद्र का खारा पानी तेजी से अंदर घुस रहा है, जिसका सीधा और घातक असर सुंदरबन समेत कई बड़े इको-सेंसिटिव इलाकों पर पड़ रहा है। उन्होंने पर्यावरण की चिंता जताते हुए कहा, “खारापन बढ़ने से कई दुर्लभ पेड़-पौधे नष्ट हो रहे हैं और सुंदरबन के जानवर विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं। हमें यह बैराज हर हाल में बनाना ही होगा ताकि मॉनसून के अतिरिक्त पानी को स्टोर करके हम उसे सूखे के मौसम में अपने किसानों और आम जनता को समय पर उपलब्ध करा सकें।”

भारत के साथ जल बंटवारा और मियाद खत्म हो रही ऐतिहासिक संधि

बांग्लादेश और भारत के बीच साझा नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर लंबे समय से गंभीर असहमति और विवाद रहा है। साल 1996 में दोनों देशों के बीच गंगा नदी के जल बंटवारे पर एक ऐतिहासिक 30 वर्षीय संधि हुई थी, जिसकी आधिकारिक मियाद इसी साल यानी दिसंबर 2026 में पूरी तरह खत्म हो रही है। ढाका के अधिकारियों के मुताबिक, इस बेहद महत्वपूर्ण समझौते को दोबारा रिन्यू करने के लिए दोनों पक्षों के बीच फिलहाल पर्दे के पीछे बातचीत चल रही है। वहीं, दूसरी तरफ तीस्ता नदी के जल बंटवारे को लेकर अधिकारियों का कहना है कि दोनों देश इस समझौते के मसौदे पर पूरी तरह सहमत तो हो गए थे, लेकिन भारत के भीतर पश्चिम बंगाल राज्य के कड़े विरोध के चलते इस पर अब तक हस्ताक्षर नहीं हो सके हैं। बताया गया कि पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने राज्य के किसानों के हितों का हवाला देते हुए इस समझौते का पुरजोर विरोध किया था, जिसके बाद से यह ठंडे बस्ते में है।

रहमान के ऐलान और चीन की एंट्री से भारत पर क्या होगा असर?

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान द्वारा तीस्ता बैराज प्रोजेक्ट के निर्माण का ऐलान और इसके लिए सीधे चीन से फंडिंग मांगने की इस नई जिद ने नई दिल्ली की राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक कूटनीति के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने इसी महीने (मई 2026) बीजिंग का दौरा कर अपने चीनी समकक्ष वांग यी से मुलाकात की है और इस करीब 1 अरब डॉलर के मेगा प्रोजेक्ट के लिए औपचारिक रूप से चीनी मदद की मांग की है। भारत के लिए यह सिर्फ एक नदी या जल प्रबंधन की परियोजना नहीं है, बल्कि यह उसके अपने पड़ोस में राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक प्रभाव से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मामला है। भारत की सुरक्षा पर इसके संभावित असर को इन दो मुख्य और बेहद गंभीर बिंदुओं के जरिए आसानी से समझा जा सकता है:

‘चिकन नेक’ (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) की सुरक्षा पर सीधा और बड़ा खतरा

भारतीय रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की सबसे बड़ी और प्राथमिक चिंता देश की संप्रभुता को लेकर है। तीस्ता नदी का यह पूरा बांग्लादेशी क्षेत्र भारत के रणनीतिक रूप से सबसे ज्यादा संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर (जिसे ‘चिकन नेक’ भी कहा जाता है) के बेहद करीब स्थित है। यह महज 60 किलोमीटर लंबा और 20 किलोमीटर चौड़ा एक संकरा जमीनी रास्ता है, जो पूरे पूर्वोत्तर (नॉर्थ-ईस्ट) के राज्यों को शेष भारत की मुख्य भूमि से आपस में जोड़ता है। इस प्रोजेक्ट के बहाने नदी प्रबंधन, गाद निकालने, निर्माण और इंजीनियरिंग के नाम पर चीन की सरकारी कंपनियों (जैसे- पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन ऑफ चाइना) और सैकड़ों चीनी इंजीनियरों व तकनीकी विशेषज्ञों की इस संवेदनशील इलाके में स्थायी मौजूदगी भारत की सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बहुत बड़ा ‘रेड फ्लैग’ है, जिसे भारत कभी स्वीकार नहीं कर सकता।

कूटनीतिक मोर्चे पर नई दिल्ली के लिए बड़ा झटका

यह कदम दक्षिण एशिया की जल कूटनीति में भारत के लिए एक कड़े और कड़वे संदेश की तरह है। भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारा समझौता साल 2011 से ही लगातार अटका हुआ है। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान, भारत ने इस तीस्ता प्रोजेक्ट के लिए अपनी तरफ से तकनीकी और आर्थिक मदद की पेशकश की थी ताकि चीनी ड्रैगन को अपने इस संवेदनशील बॉर्डर से दूर रखा जा सके। लेकिन अब बांग्लादेश में हुए तख्तापलट और राजनीतिक बदलाव के बाद तारिक रहमान (BNP) की नई सरकार के सत्ता में आते ही ढाका का बीजिंग की तरफ झुकाव पूरी तरह से जगजाहिर हो गया है। इस कदम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश जाता है कि अगर भारत अपनी आंतरिक राजनीति के कारण पड़ोसियों के साथ समझौते समय पर पूरे नहीं कर पाता है, तो उसके पड़ोसी देश भारत के हितों को दरकिनार कर अन्य विकल्पों (विशेष रूप से चीन) की ओर रुख करने से बिल्कुल भी गुरेज नहीं करेंगे।