नेपाल-भारत खाद संकट: विवाद के बीच भारत ने निभाया पड़ोसी का धर्म

काठमांडू: अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि देश अपनी भौगोलिक सीमाएं नहीं बदल सकते, लेकिन संबंध उतार-चढ़ाव भरे हो सकते हैं। भारत और नेपाल के बीच हालिया घटनाक्रम इसका सटीक उदाहरण है। एक तरफ जहां नेपाल की बालेन शाह सरकार ने ‘लिपुलेख दर्रे’ (Lipulekh Pass) को लेकर एक बार फिर पुराना विवाद छेड़ा है, वहीं दूसरी तरफ अपने देश में खेती बचाने के लिए भारत के आगे हाथ भी फैलाए हैं। भारत ने भी बड़े भाई की भूमिका निभाते हुए राजनीतिक तनाव को दरकिनार कर नेपाल को खाद संकट से उबारने का फैसला किया है।

अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच खाद की कीमतें आसमान पर

पूरी दुनिया में इस समय उर्वरकों (Fertilizers) की कीमतें बेलगाम हो रही हैं। अमेरिका और ईरान के बीच छिड़े युद्ध ने वैश्विक सप्लाई चेन को तोड़ दिया है, जिससे खाद के दाम लगभग दोगुने हो गए हैं। ‘रॉयटर्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत पहले जहां 512 डॉलर प्रति टन के भाव से यूरिया खरीद रहा था, अब वही कीमत बढ़कर 959 डॉलर प्रति टन हो गई है। बावजूद इसके, भारत अपने पड़ोसी नेपाल को वैश्विक बाजार से काफी कम और पुरानी दरों पर खाद उपलब्ध कराने जा रहा है।

नेपाल में गहराया खेती का संकट: स्टॉक में भारी कमी

नेपाल इस समय बुवाई के सीजन की दहलीज पर खड़ा है, लेकिन ‘द काठमांडू पोस्ट’ के मुताबिक वहां खाद का भारी अकाल है।

  • जरूरत: 2.5 लाख टन

  • मौजूदा स्टॉक: केवल 1.71 लाख टन नेपाल के कृषि मंत्रालय का कहना है कि यदि वे अंतरराष्ट्रीय बाजार से सीधे खाद खरीदते हैं, तो सरकार को 80 अरब रुपये की भारी सब्सिडी देनी होगी, जो नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए असंभव है। इसी मजबूरी में नेपाल ने भारत की ‘राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड’ के साथ जी-टू-जी (G-to-G) समझौता किया है, जिसके तहत 60,000 टन यूरिया और 20,000 टन डीएपी (DAP) की आपूर्ति की जाएगी।

लिपुलेख विवाद: दावों और तथ्यों की जंग

एक ओर जहां भारत मदद का हाथ बढ़ा रहा है, वहीं नेपाल का विदेश मंत्रालय क्षेत्रीय दावों पर अड़ा है। नेपाल ने भारत और चीन दोनों को विरोध पत्र भेजकर ‘कैलाश मानसरोवर यात्रा’ के लिए लिपुलेख मार्ग के उपयोग पर आपत्ति जताई है।

  • नेपाल का दावा: लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल का हिस्सा हैं।

  • भारत का जवाब: भारत ने स्पष्ट किया है कि लिपुलेख दर्रा 1954 से ही मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक और ऐतिहासिक मार्ग रहा है। भारत के विदेश मंत्रालय ने नेपाल के दावों को ‘कृत्रिम और एकतरफा विस्तार’ बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया है।

कूटनीति बनाम मानवीय मदद

भारत का यह कदम दिखाता है कि वह ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (Padosi Pehle) की नीति पर कायम है। खुद भारी कीमत चुकाने के बावजूद नेपाल को पुराने समझौते के तहत सस्ते रेट पर खाद देना भारत की उदारता को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल को अपनी भड़काऊ बयानबाजी के बजाय जमीनी हकीकत और क्षेत्रीय सहयोग पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि संकट के समय अंततः भारत ही सबसे पहले मदद के लिए खड़ा होता है।