
दुनिया भर के ऊर्जा और तेल-गैस बाजार से इस वक्त की सबसे बड़ी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हड़कंप मचाने वाली खबर सामने आ रही है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण युद्ध के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला एक बहुत बड़ा फैसला होने जा रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अमेरिकी कांग्रेस की एक बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान साफ संकेत दिए हैं कि अमेरिका बहुत जल्द रूसी तेल की खरीद पर दी गई अपनी विशेष प्रतिबंध छूट (Sanctions Waiver) को पूरी तरह समाप्त करने की योजना बना रहा है। आपको बता दें कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा और प्रमुख देशों में शामिल रहा है जिसने इस अमेरिकी छूट का सबसे ज्यादा फायदा उठाया था, क्योंकि इसी अस्थायी राहत के चलते भारतीय रिफाइनरियों को रूस से रिकॉर्ड मात्रा में सस्ते कच्चे तेल की खरीद दोबारा शुरू करने का एक बड़ा मौका मिला था।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी के कारण मिली थी अस्थायी राहत, अब खत्म हो रही है समय सीमा
अमेरिकी सीनेट की विदेश नीति समिति के सामने अपनी बात रखते हुए विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्पष्ट किया कि रूसी कच्चे तेल पर दी गई वर्तमान छूट केवल एक सीमित समय के लिए लागू की गई आपातकालीन व्यवस्था थी। इसे अमेरिकी प्रशासन द्वारा केवल इसलिए मंजूरी दी गई थी ताकि अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध के कारण रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी से वैश्विक तेल आपूर्ति में जो भारी रुकावट आई थी, उसे कम किया जा सके और आसमान छूती अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर लगाम लगाई जा सके। मार्को रुबियो ने कड़े शब्दों में कहा कि अमेरिका इस छूट को जितनी जल्दी हो सके समाप्त करना चाहता है क्योंकि वाशिंगटन की मूल नीति रूस के तेल निर्यात पर सख्त से सख्त प्रतिबंध लगाने की रही है। अमेरिका ने पहली बार इस साल मार्च में इस छूट की घोषणा की थी, जिसके बाद इसे दो बार बढ़ाया गया और अब इसकी अंतिम समय सीमा आगामी 17 जून को समाप्त होने जा रही है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग इस पर अंतिम मुहर लगाएगा कि इसे आगे बढ़ाया जाए या नहीं।
भारत की बढ़ेगी टेंशन: ट्रंप के 25% अतिरिक्त टैरिफ के बाद पहले भी बंद करना पड़ा था रूसी तेल
इस विशेष अमेरिकी छूट के खत्म होने से भारत के लिए कच्चे तेल का संकट और आयात लागत का गणित एक बार फिर बुरी तरह गड़बड़ा सकता है। गौरतलब है कि भारत ने पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए अतिरिक्त 25% टैरिफ के भारी दबाव के बाद रूस से तेल की खरीद को पूरी तरह बंद करने का एक बड़ा फैसला लिया था। उस समय राष्ट्रपति ट्रंप ने सीधे तौर पर भारत पर यूक्रेन युद्ध के लिए रूसी राष्ट्रपति पुतिन को आर्थिक फंडिंग करने का गंभीर आरोप मढ़ा था। वाइट हाउस के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, भारत ने अमेरिका के साथ हुए एक महत्वपूर्ण द्विपक्षीय व्यापार समझौते के तहत रूस से कच्चे तेल की खरीद रोकने की बड़ी प्रतिबद्धता जताई थी, जिसके बदले में राष्ट्रपति ट्रंप ने भारतीय उत्पादों पर लगाया गया 25% का अतिरिक्त टैरिफ वापस ले लिया था।
वेनेजुएला की तरफ झुकाव बढ़ाने की बड़ी अमेरिकी चाल, 17 जून के बाद रिफाइनरियों को तलाशने होंगे नए रास्ते
रूस से तेल आयात रोकने की शर्तों के बीच अमेरिका लगातार भारत को वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीदने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करता रहा है, विशेष रूप से वेनेजुएला में हुए अमेरिकी सैन्य छापे और वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़े जाने के बाद। आपको बता दें कि 28 फरवरी को जब अमेरिका और ईरान के बीच सीधा युद्ध छिड़ा, तब तेहरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए होर्मुज जलमार्ग को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया था। यह समुद्री मार्ग दुनिया की 20% और पूरे दक्षिण एशिया की करीब 40% तेल और गैस आपूर्ति का मुख्य जीवन रेखा माना जाता है। खाड़ी देशों से आने वाला यह रास्ता बंद होने के बाद ही अमेरिका ने भारत को आपातकालीन राहत देते हुए रूसी तेल खरीदने की यह अस्थायी छूट दी थी। जानकारों का कहना है कि 17 जून को यह छूट खत्म होने के बाद अमेरिका एक बार फिर भारत को वेनेजुएला के तेल बाजार की तरफ धकेलेगा, जिसके सिलसिले में वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज इसी हफ्ते अमेरिका के बेहद महत्वपूर्ण दौरे पर भी आने वाली हैं। अगर अमेरिकी ट्रेजरी विभाग इस छूट को आगे नहीं बढ़ाता है, तो भारतीय तेल कंपनियों को अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए नए रणनीतिक रास्ते और नए विकल्प तलाशने होंगे।
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