
इजरायल और लेबनान के बीच जारी भीषण तनाव के बीच एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। संघर्षविराम की तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद जमीन पर खून-खराबा थमने का नाम नहीं ले रहा है। ईरान पर हुए इजरायली और अमेरिकी हमलों के बाद हिजबुल्लाह के खुलकर ईरान के समर्थन में आने से यह आग और भड़क गई। इसी क्रम में इजरायली सेना ने एक बड़ा सैन्य कदम उठाते हुए लेबनान के अंदर घुसकर सदियों पुराने ऐतिहासिक ब्यूफोर्ट कैसल (किले) और उसके आस-पास की पूरी रेंज पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है।
इस ऐतिहासिक किले पर कब्जे को इजरायल के सैन्य इतिहास में एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। रणनीतिक रूप से यह जगह इतनी ज्यादा संवेदनशील और अहम है कि इसके नियंत्रण के बाद पूरे क्षेत्र का सैन्य समीकरण बदल सकता है।
प्रधानमंत्री नेतन्याहू का बड़ा एलान और वैश्विक प्रतिक्रिया
इस किले की अहमियत का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि खुद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सामने आकर आधिकारिक रूप से इसकी घोषणा की। जैसे ही ब्यूफोर्ट किले की सबसे ऊंची चोटी पर इजरायल का झंडा फहराया गया, नेतन्याहू ने बेहद आक्रामक अंदाज में कहा कि आज हम एक बिल्कुल अलग रूप में ब्यूफोर्ट लौटे हैं, एकजुट और पहले से कहीं ज्यादा मजबूत होकर। इजरायल भले ही इसे अपनी एक बहुत बड़ी जीत के रूप में देख रहा हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस कदम का कड़ा विरोध शुरू हो गया है। ब्रिटेन और फ्रांस सहित कई यूरोपीय देशों ने इजरायल की इस सैन्य कार्रवाई की तीखी आलोचना की है। वैश्विक नेताओं का कहना है कि इस तरह के कदम क्षेत्र में उकसावे को बढ़ावा देते हैं, जिसे किसी भी कीमत पर सही नहीं ठहराया जा सकता। वहीं दूसरी तरफ, लेबनान के प्रधानमंत्री ने भी इजरायल पर संप्रभुता के उल्लंघन के बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं।
आखिर क्या है ब्यूफोर्ट कैसल और इसका सदियों पुराना इतिहास
युद्ध के मैदान में आखिर इस एक किले के लिए इतनी बड़ी बाजी क्यों लगाई गई, इसे समझने के लिए हमें इसके इतिहास और भूगोल को जानना होगा। ब्यूफोर्ट कैसल लेबनान के नबातियेह शहर के पास स्थित है, जो लितानी नदी के ठीक ऊपर एक बेहद खड़ी और विशाल चट्टान पर बना हुआ है। यह किला लगभग 900 साल पुराना है। यूनेस्को (UNESCO) के दस्तावेजों के अनुसार, मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में यह अपने समय के सबसे सुरक्षित, मजबूत और बेहतरीन किलों में से एक माना जाता है। इस ऐतिहासिक दुर्ग का निर्माण 12वीं शताब्दी में क्रूसेडर्स (धर्मयोद्धाओं) द्वारा किया गया था। अगर इसके नाम के शाब्दिक अर्थ को समझें तो फ्रांसीसी भाषा में ‘ब्यूफोर्ट’ का मतलब ‘खूबसूरत किला’ होता है, जबकि स्थानीय अरबी भाषा में लोग इसे ‘कलाई अल-शकीफ’ के नाम से पुकारते हैं।
ऊंचाई का वो फायदा जिससे कांपते हैं दुश्मन: क्यों अहम है यह किला
रक्षा विशेषज्ञों और सैन्य विश्लेषकों के मुताबिक, ब्यूफोर्ट कैसल का भौगोलिक और रणनीतिक महत्व इतना ज्यादा है कि जो भी इस पर राज करेगा, वह पूरे इलाके पर अपनी सीधी नजर रख सकता है। यह किला इतनी बेजोड़ ऊंचाई पर बना है कि यहां तैनात होकर उत्तरी इजरायल के ‘गैलीली पैनहैंडल’ और दक्षिणी लेबनान के ‘नबातियेह’ इलाके के चप्पे-चप्पे को दूरबीन से साफ देखा जा सकता है। यहां मौजूद सेना कई किलोमीटर दूर तक दुश्मन की छोटी से छोटी हलचल और उनके सैनिकों की मूवमेंट को बहुत ही आसानी से ट्रैक कर सकती है। सीधे शब्दों में कहें तो यह किला युद्ध के समय दुश्मनों को धूल चटाने और सर्विलांस (निगरानी) के लिए एक अचूक हथियार की तरह काम करता है।
पहले भी जंग का अखाड़ा बन चुका है यह ऐतिहासिक दुर्ग
यह कोई पहली बार नहीं है जब ब्यूफोर्ट कैसल इजरायल और लेबनान के बीच बारूद की गंध से महका हो। इससे पहले साल 1982 के लेबनान युद्ध के दौरान भी इजरायली सेना ने इस किले को फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन (PLO) के कब्जे से छीन लिया था। उस वक्त इजरायल ने इसे एक बेहद मजबूत मिलिट्री पोस्ट में तब्दील कर दिया था और करीब 18 सालों तक इस पर अपना नियंत्रण बनाए रखा था। हालांकि, बाद में इस पर हिजबुल्लाह ने अपना कब्जा जमा लिया था। इजरायली डिफेंस फोर्सेज (IDF) का दावा है कि हिजबुल्लाह ने ईरान की मदद से इस प्राचीन किले के भीतर और पहाड़ी के नीचे एक बहुत ही विशाल, आधुनिक और गुप्त सैन्य बुनियादी ढांचा (टनल नेटवर्क) तैयार कर रखा था। इसी पहाड़ी और मजबूत किले की आड़ लेकर हिजबुल्लाह लंबे समय से इजरायल के रिहायशी इलाकों पर सैकड़ों रॉकेट दाग रहा था, जिसे रोकने के लिए इजरायल ने अब अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
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