Kamakhya Temple : नीलाचल पर्वत का वो रहस्य अंबुबाची मेले के दौरान क्यों लाल हो जाता है ब्रह्मपुत्र का पानी? जानें मंदिर से जुड़ी बातें

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News India Live, Digital Desk: असम की राजधानी गुवाहाटी में नीलाचल पर्वत पर स्थित मां कामाख्या देवी मंदिर को 51 शक्तिपीठों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मंदिर न केवल अपनी तांत्रिक सिद्धियों के लिए विख्यात है, बल्कि यहाँ होने वाली एक प्राकृतिक और आध्यात्मिक घटना पूरी दुनिया के लिए रहस्य बनी हुई है। ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल अंबुबाची मेले के दौरान मंदिर के पास से बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का पानी अचानक तीन दिनों के लिए लाल हो जाता है।

क्यों लाल होता है ब्रह्मपुत्र का पानी?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अंबुबाची मेले के दौरान मां कामाख्या ‘रजस्वला’ (Menstruation) होती हैं।

प्राकृतिक मान्यता: कहा जाता है कि इन तीन दिनों में मां के गर्भ गृह से एक तरल पदार्थ निकलता है, जिसके स्पर्श से पास की नदी का पानी रक्त के समान लाल हो जाता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण: कुछ भूवैज्ञानिकों का मानना है कि वहां की मिट्टी में प्रचुर मात्रा में ‘आयरन ऑक्साइड’ और ‘सिनेबार’ होने के कारण मानसून के दौरान जल का रंग बदल जाता है, लेकिन भक्त इसे पूरी तरह से देवी का चमत्कार मानते हैं।

तीन दिनों तक बंद रहते हैं मंदिर के कपाट

मेले के शुरुआती तीन दिनों तक मंदिर के कपाट भक्तों के लिए पूरी तरह बंद रहते हैं।

इन दिनों मंदिर के अंदर कोई पूजा-पाठ नहीं होता और न ही शंख या घंटियाँ बजाई जाती हैं।

माना जाता है कि इन तीन दिनों में मां कामाख्या विश्राम करती हैं। चौथे दिन मंदिर के कपाट एक भव्य अनुष्ठान के बाद खोले जाते हैं।

अंगवस्त्र (रक्त वस्त्र) का रहस्य

कामाख्या मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ मिलने वाला प्रसाद है, जिसे ‘अंबुबाची वस्त्र’ या ‘अंगवस्त्र’ कहा जाता है।

मंदिर के कपाट बंद करने से पहले माता की प्रतिमा के पास सफेद रंग का सूती कपड़ा रखा जाता है।

तीन दिन बाद जब कपाट खुलते हैं, तो वह कपड़ा माता के शरीर के स्पर्श से लाल रंग में भीगा हुआ मिलता है। इस कपड़े को ‘रक्त वस्त्र’ के रूप में भक्तों में बांटा जाता है, जिसे धारण करना अत्यंत शुभ और सुख-समृद्धि प्रदायक माना जाता है।

तंत्र विद्या का सबसे बड़ा केंद्र

कामाख्या मंदिर को ‘अघोरियों’ और ‘तांत्रिकों’ का गढ़ माना जाता है। अंबुबाची मेले के दौरान देश-विदेश से हजारों तांत्रिक यहाँ अपनी सिद्धियों को जागृत करने आते हैं। यहाँ मां की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि एक शिलाखंड (पत्थर) है जिसे योनि के रूप में पूजा जाता है।

मंदिर से जुड़ी 3 अनसुनी बातें:

कोई प्रतिमा नहीं: यहाँ देवी की पूजा उनके विग्रह रूप में नहीं, बल्कि प्राकृतिक शिला के रूप में होती है जिसमें से हमेशा जल की धारा बहती रहती है।

योनि पूजा: सती के आत्मदाह के बाद जब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर के 51 टुकड़े किए थे, तब यहाँ माता की ‘योनि’ गिरी थी।

मुगल आक्रमण: कहा जाता है कि कालापहाड़ नामक आक्रमणकारी ने इस मंदिर को तोड़ने की कोशिश की थी, लेकिन वह देवी के प्रकोप से बच नहीं सका।

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