बिना आपकी सहमति के बैंक ने भेज दिया क्रेडिट कार्ड? जानिए RBI के कड़े नियम और अपने 15 कानूनी अधिकार, बैंक को देना पड़ सकता है दोगुना हर्जाना

डिजिटल बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं के तेजी से बढ़ते प्रसार के बीच आज क्रेडिट कार्ड दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है। लेकिन इसके साथ ही आक्रामक मार्केटिंग और मासिक टारगेट पूरा करने के दबाव में कई बैंक और नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां (NBFCs) ग्राहकों की स्पष्ट सहमति के बिना ही उनके पते पर क्रेडिट कार्ड डिस्पैच कर देती हैं या बिना बताए कार्ड अपग्रेड कर देती हैं। कई बार ग्राहक इस असमंजस में पड़ जाते हैं कि क्या यह कार्ड सक्रिय होगा, क्या इस पर सालाना फीस कटने लगेगी, या फिर उनके सिबिल स्कोर पर कोई नकारात्मक असर पड़ेगा। यदि आपके साथ भी ऐसा हुआ है या आपके पास लगातार अनचाहे क्रेडिट कार्ड के ऑफर आ रहे हैं, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ‘क्रेडिट कार्ड एंड डेबिट कार्ड – इश्यूअेंस एंड कंडक्ट डायरेक्शंस’ आपके पक्ष में एक बेहद मजबूत ढाल प्रदान करते हैं। केंद्रीय बैंक ने उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए ऐसे कड़े प्रावधान किए हैं कि यदि कोई वित्तीय संस्थान बिना पूर्व अनुमति के कार्ड जारी करता है, तो उसे न केवल कार्ड तुरंत रद्द करना होगा बल्कि ग्राहक को हर्जाने के तौर पर भारी जुर्माना भी चुकाना पड़ेगा। जागरूक उपभोक्ता के रूप में आपको अपने उन 15 बुनियादी अधिकारों के बारे में विस्तार से जानना चाहिए, जो आपको किसी भी वित्तीय धोखाधड़ी या बैंक की मनमानी से बचाते हैं।

आरबीआई के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अनुसार, कोई भी बैंक या कार्ड जारीकर्ता संस्थान ग्राहक की पूर्व लिखित या स्पष्ट डिजिटल सहमति (Explicit Consent) के बिना क्रेडिट कार्ड जारी नहीं कर सकता। यदि किसी उपभोक्ता को उसकी अनुमति के बिना कोई अनचाहा (Unsolicited) कार्ड भेजा जाता है और उस पर कोई भी शुल्क लगाया जाता है, तो बैंक को वह कार्ड तुरंत बिना किसी शुल्क के बंद करना होगा। इसके अलावा, यदि बैंक ने उस कार्ड पर कोई चार्ज या बिल जनरेट किया है, तो बैंक को उस शुल्क को वापस करने के साथ-साथ ग्राहक को उस राशि का दोगुना जुर्माना हर्जाने के रूप में चुकाना अनिवार्य है।

कई बार धोखे से भेजे गए कार्ड घर के किसी कोने में बिना एक्टिवेट हुए पड़े रहते हैं। आरबीआई का नियम कहता है कि यदि ग्राहक को कार्ड मिलने के 30 दिनों के भीतर कार्डधारक द्वारा वन-टाइम पासवर्ड (OTP) या पिन बनाकर उसे सक्रिय नहीं किया जाता है, तो बैंक को ग्राहक से दोबारा पुष्टि मांगनी होगी। यदि ग्राहक अगले 7 दिनों में सक्रिय करने की सहमति नहीं देता, तो बैंक को बिना कोई फीस या पेनल्टी लगाए उस क्रेडिट कार्ड खाते को स्वतः स्थायी रूप से बंद करना होगा और इसकी सूचना तुरंत ग्राहक को देनी होगी।

यदि आप अपना कोई भी चालू क्रेडिट कार्ड बंद कराना चाहते हैं, तो बैंक आपको अनावश्यक प्रक्रियाओं में उलझा नहीं सकता। बैंक को अपनी वेबसाइट, मोबाइल ऐप, हेल्पलाइन, एसएमएस और ईमेल पर कार्ड क्लोजर का सीधा विकल्प देना अनिवार्य है। ग्राहक द्वारा सभी बकाए चुकाकर कार्ड बंद करने का अनुरोध दर्ज कराने के 7 कार्यदिवसों (Working Days) के भीतर बैंक को कार्ड अनिवार्य रूप से बंद करना होगा। यदि बैंक 7 दिनों के भीतर कार्ड बंद करने में विफल रहता है, तो उसे देरी के लिए ग्राहक को ₹500 प्रति दिन के हिसाब से हर्जाना देना होगा, बशर्ते खाते में कोई बकाया न हो।

बैंक अपनी मर्जी से ग्राहक की क्रेडिट लिमिट नहीं बढ़ा सकते। कई बार बैंक खर्च को बढ़ावा देने के लिए बिना पूछे लिमिट बढ़ा देते हैं, जिससे कार्ड खोने या फ्रॉड होने पर जोखिम बढ़ जाता है। नियमों के मुताबिक, किसी भी कार्डधारक की क्रेडिट लिमिट बढ़ाने से पहले बैंक को उसकी स्पष्ट लिखित या इलेक्ट्रॉनिक सहमति लेना अनिवार्य है। बिना सहमति के बढ़ाई गई लिमिट पूरी तरह अवैध मानी जाती है।

कार्ड जारी करते समय बैंकों को ‘मोस्ट इम्पोर्टेंट टर्म्स एंड कंडीशंस’ (MITC) नामक एक स्पष्ट दस्तावेज ग्राहक को देना होता है। इस दस्तावेज में कार्ड से जुड़े सभी शुल्क जैसे वार्षिक शुल्क, ज्वाइनिंग फीस, कैश विड्रॉल चार्ज, लेट पेमेंट फीस और वार्षिक प्रतिशत दर (APR) बड़े और साफ अक्षरों में दर्ज होने चाहिए। यदि किसी शुल्क का उल्लेख एमआईटीसी दस्तावेज में पहले से नहीं किया गया है, तो बैंक भविष्य में ऐसा कोई भी छिपा हुआ शुल्क ग्राहक पर नहीं थोप सकता।

यदि आपके क्रेडिट कार्ड से कोई साइबर फ्रॉड या अनधिकृत ट्रांजैक्शन हो जाता है, तो आपको घबराने की जरूरत नहीं है। आरबीआई की ‘सीमित ग्राहक देयता’ नीति के तहत, यदि सिस्टम की खामी या बैंक की ओर से सुरक्षा चूक हुई है, तो ग्राहक की देयता शून्य होती है। वहीं, यदि किसी थर्ड-पार्टी धोखाधड़ी के मामले में ग्राहक 3 कार्यदिवसों के भीतर बैंक को अनधिकृत लेन-देन की सूचना दे देता है, तो उस अवैध निकासी के लिए ग्राहक की कोई वित्तीय जिम्मेदारी नहीं होगी और पूरा पैसा बैंक को वहन करना होगा।

यदि किसी कारणवश क्रेडिट कार्ड का भुगतान बकाया रह जाता है, तो भी बैंक या उसके रिकवरी एजेंट्स को ग्राहक के साथ असभ्य व्यवहार करने की कतई अनुमति नहीं है। आरबीआई के सख्त नियमों के अनुसार, रिकवरी एजेंट केवल सुबह 8:00 बजे से शाम 7:00 बजे के बीच ही ग्राहक से संपर्क कर सकते हैं। वे किसी भी परिस्थिति में ग्राहक को धमकी नहीं दे सकते, सार्वजनिक रूप से अपमानित नहीं कर सकते, अनुचित भाषा का प्रयोग नहीं कर सकते और न ही परिवार के सदस्यों, दोस्तों या सहकर्मियों को फोन करके परेशान कर सकते हैं। ऐसा करने पर संबंधित बैंक के खिलाफ भारी विनियामक जुर्माना लगाया जा सकता है।

हर वेतनभोगी की सैलरी की तारीख एक जैसी नहीं होती। इसी को ध्यान में रखते हुए आरबीआई ने कार्डधारकों को यह अधिकार दिया है कि वे अपने पूरे कार्ड जीवनकाल में कम से कम एक बार अपनी सुविधा के अनुसार बिलिंग चक्र (Billing Cycle) और भुगतान की अंतिम तारीख (Payment Due Date) में बदलाव कर सकते हैं। इससे ग्राहक अपनी सैलरी आने के समय के अनुसार बिल भरने की तिथि निर्धारित कर लेट पेमेंट फीस से बच सकते हैं।

यदि किसी बैंक की तकनीकी त्रुटि या बिना पूछे जारी किए गए कार्ड के कारण आपका सिबिल (CIBIL) या क्रेडिट स्कोर खराब हो जाता है, तो आपको उसे तुरंत ठीक कराने का अधिकार है। शिकायत दर्ज कराने के बाद यदि क्रेडिट ब्यूरो और बैंक 30 दिनों के भीतर गलत डेटा को सुधारने में विफल रहते हैं, तो शिकायतकर्ता को 30 दिन की समयसीमा समाप्त होने के बाद ₹100 प्रति दिन के हिसाब से मुआवजा पाने का कानूनी अधिकार प्राप्त है।

अक्सर ग्राहक क्रेडिट कार्ड बिल में केवल ‘न्यूनतम देय राशि’ (Minimum Due) भरकर यह सोचते हैं कि उन्होंने बिल चुका दिया है। आरबीआई ने बैंकों के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि वे मासिक बिलिंग स्टेटमेंट में एक स्पष्ट चेतावनी बॉक्स लगाएं, जिसमें यह साफ लिखा हो कि केवल न्यूनतम राशि चुकाने से शेष रकम पर 40 से 45 प्रतिशत तक का भारी चक्रवृद्धि ब्याज लगेगा और कर्ज पूरी तरह खत्म होने में कई साल लग सकते हैं।

जब कोई ग्राहक अपना क्रेडिट कार्ड खाता पूरी तरह बंद कर देता है, तो बैंक की यह कानूनी जिम्मेदारी होती है कि वह अगले 30 दिनों के भीतर सभी चार प्रमुख क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनियों (CIBIL, Experian, Equifax, CRIF High Mark) को सूचित करे कि यह खाता पूरी तरह ‘बंद’ (Closed) हो चुका है और इस पर कोई बकाया नहीं है, ताकि ग्राहक की भविष्य की लोन पात्रता प्रभावित न हो।

बैंक अक्सर क्रेडिट कार्ड के साथ बिना पूछे व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा, कार्ड प्रोटेक्शन प्लान (CPP) या अन्य सशुल्क सेवाएं बंडल कर देते हैं और हर महीने उसका प्रीमियम काटते हैं। नियमों के अनुसार, जब तक ग्राहक ऐसे किसी ऐड-ऑन उत्पाद के लिए अलग से स्पष्ट सहमति नहीं देता, तब तक बैंक उसके खाते से कोई भी प्रीमियम नहीं काट सकता। यदि ऐसा काटा गया है, तो ग्राहक पूरा रिफंड पाने का हकदार है।

ग्राहकों द्वारा दिन-रात खरीदारी करके जुटाए गए रिवॉर्ड पॉइंट्स उनकी संपत्ति होते हैं। बैंक अपनी मर्जी से अचानक रिवॉर्ड पॉइंट्स की वैल्यू कम नहीं कर सकते और न ही उन्हें बिना बताए एक्सपायर कर सकते हैं। नियम के मुताबिक, रिवॉर्ड पॉलिसी में किसी भी प्रकार का बदलाव करने या पॉइंट्स के रिडेम्पशन नियमों को बदलने से कम से कम 30 दिन पहले बैंक को कार्डधारक को एसएमएस या ईमेल के जरिए सूचित करना अनिवार्य है।

यदि आपको लगता है कि आपके बिल में कोई गलत चार्ज, अनचाही सदस्यता या गलत ट्रांजैक्शन जुड़ गया है, तो आप बिल जारी होने के 60 दिनों के भीतर बैंक के समक्ष आधिकारिक शिकायत दर्ज कर सकते हैं। जब तक बैंक उस विवादित लेन-देन की निष्पक्ष जांच पूरी नहीं कर लेता, तब तक बैंक उस विशेष विवादित राशि पर कोई लेट पेमेंट चार्ज या ब्याज नहीं लगा सकता और न ही उस विवादित रकम को डिफॉल्ट बताकर क्रेडिट ब्यूरो को रिपोर्ट कर सकता है।

यदि क्रेडिट कार्ड से जुड़ी किसी भी समस्या, अनचाहे कार्ड, गलत वसूली या दुर्व्यवहार के संबंध में संबंधित बैंक 30 दिनों के भीतर आपकी शिकायत का संतोषजनक समाधान नहीं करता है, तो आप सीधे ‘भारतीय रिजर्व बैंक लोकपाल’ (RBI Integrated Ombudsman Scheme) के समक्ष ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकते हैं। आरबीआई लोकपाल के पोर्टल (cms.rbi.org.in) पर की गई शिकायतों पर त्वरित सुनवाई होती है और दोषी पाए जाने पर बैंक को ग्राहक के पूरे नुकसान की भरपाई के साथ-साथ मानसिक प्रताड़ना के लिए हर्जाना देने का आदेश भी दिया जाता है।