EMI नहीं चुका पाए तो क्या आप willful defaulter बन जाएंगे? जानिए लोन डिफॉल्ट से यह कैसे है अलग और क्या हैं दोनों के बीच 5 बड़े अंतर

आज के दौर में होम लोन, ऑटो लोन, पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड की मासिक किश्त (EMI) चुकाना हर मध्यमवर्गीय और कामकाजी व्यक्ति के वित्तीय बजट का अहम हिस्सा बन चुका है। लेकिन जिंदगी कभी भी एक जैसी नहीं रहती; अप्रत्याशित रूप से नौकरी चले जाना, गंभीर बीमारी, व्यापार में भारी मंदी या पारिवारिक संकट के चलते कई बार समय पर ईएमआई भर पाना मुमकिन नहीं होता। जैसे ही किसी व्यक्ति की लगातार दो या तीन ईएमआई बाउंस होती हैं, उसके मन में कानूनी कार्रवाई, जेल जाने और सबसे बड़ा डर इस बात का बैठ जाता है कि कहीं बैंक उसे ‘विलफुल डिफॉल्टर’ (Wilful Defaulter) यानी जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाला घोषित न कर दे। भारतीय बैंकिंग नियामक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के कानूनी नियमों के अनुसार, किसी वित्तीय लाचारी या मजबूरी के चलते ईएमआई न भर पाने पर कोई भी कर्जदार सीधे विलफुल डिफॉल्टर नहीं बनता है। केंद्रीय बैंक ने ‘कर्ज चुकाने में असमर्थता’ और ‘कर्ज चुकाने से जानबूझकर इंकार करने या धोखाधड़ी करने’ के बीच बहुत स्पष्ट, पारदर्शी और कड़ा कानूनी फर्क तय किया हुआ है। अगर आपकी नीयत साफ है और सिर्फ आर्थिक हालात बिगड़ने से किस्त नहीं जा पा रही है, तो कानून आपको सामान्य ‘लोन डिफॉल्टर’ मानता है, न कि कोई वित्तीय अपराधी या विलफुल डिफॉल्टर।

बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली में डिफॉल्ट की दो अलग-अलग श्रेणियां होती हैं, जिन्हें उनकी प्रकृति, कर्जदार की नीयत और फंड के इस्तेमाल के आधार पर परखा जाता है। सामान्य ‘लोन डिफॉल्ट’ का सीधा मतलब यह होता है कि कर्जदार अपने वित्तीय दायित्व को पूरा करना चाहता है, लेकिन अप्रत्याशित वित्तीय संकट, आय का स्रोत बंद होने या नकदी प्रवाह (Cash Flow) रुक जाने की वजह से वह किस्त देने में असमर्थ है। यहां कर्जदार की ‘चुकौती क्षमता’ (Ability to Repay) प्रभावित होती है, लेकिन उसकी ‘नीयत’ (Intention) में कोई खोट नहीं होता। इसके विपरीत, ‘विलफुल डिफॉल्ट’ एक गंभीर कॉर्पोरेट या व्यक्तिगत वित्तीय कदाचार है। आरबीआई के मास्टर सर्कुलर के अनुसार, विलफुल डिफॉल्ट तब माना जाता है जब कर्जदार के पास कर्ज चुकाने के लिए बैंक खाते में पर्याप्त नकदी, तरल संपत्ति और आय मौजूद हो, फिर भी वह अपनी देनदारी चुकाने से साफ मुकर जाए। इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति बैंक से लिए गए पैसे को उस काम में न लगाकर किसी बेनामी संपत्ति, अवैध कारोबार या निजी ऐशो-आराम में उड़ा दे (फंड्स की साइफनिंग और डायवर्जन), बैंक को दिए गए वित्तीय विवरणों में फर्जीवाड़ा करे, या बैंक के पास रेहन (Mortgage) रखी संपत्ति को बैंक की लिखित अनुमति के बिना गुपचुप तरीके से बेच दे, तो उसे कानूनी रूप से विलफुल डिफॉल्टर माना जाता है।

  1. नीयत बनाम भुगतान क्षमता (Intention vs Ability to Pay): सामान्य लोन डिफॉल्ट में व्यक्ति की भुगतान क्षमता शून्य या बेहद कमजोर हो जाती है, मगर वह बैंक से संपर्क कर समय मांगता है और पैसा लौटाना चाहता है। वहीं, विलफुल डिफॉल्ट में कर्जदार के पास पर्याप्त संसाधन और संपत्ति होने के बावजूद वह बैंक को धोखा देने की नीयत से भुगतान करने से साफ इंकार कर देता है।

  2. फंड्स का डायवर्जन और साइफनिंग (Diversion and Siphoning of Funds): सामान्य डिफॉल्टर बैंक से लिए गए पैसे का इस्तेमाल उसी स्वीकृत उद्देश्य (जैसे घर बनाना, फैक्ट्री चलाना या कार खरीदना) के लिए करता है। इसके विपरीत, विलफुल डिफॉल्टर लोन के पैसे को संबंधित प्रोजेक्ट में लगाने के बजाय फर्जी शेल कंपनियों में ट्रांसफर कर देता है, बिना अनुमति किसी अन्य व्यवसाय में लगा देता है या निजी लाभ के लिए निकाल लेता है।

  3. कानूनी कार्रवाई का स्वरूप—सिविल बनाम आपराधिक मुकदमा (Civil Recovery vs Criminal Action): सामान्य लोन डिफॉल्ट के मामले में बैंक केवल सिविल रिकवरी कानूनों जैसे सरफेसी एक्ट (SARFAESI Act 2002) या डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) के माध्यम से गिरवी रखी संपत्ति को जब्त और नीलाम करके अपनी बकाया राशि वसूल सकता है। लेकिन विलफुल डिफॉल्ट के मामले में बैंक सिविल रिकवरी के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और आईपीसी की धोखाधड़ी, अमानत में खयानत और जालसाजी की धाराओं के तहत पुलिस एफआईआर (FIR) और आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाता है।

  4. क्रेडिट पात्रता और बैंकिंग सिस्टम से पाबंदी (CIBIL Score vs RBI Blacklist): सामान्य डिफॉल्ट होने पर कर्जदार का सिबिल (CIBIL) और क्रेडिट स्कोर बुरी तरह गिर जाता है, लेकिन भविष्य में जब वह कर्ज चुकता या सेटल कर देता है, तो धीरे-धीरे उसका क्रेडिट स्कोर सुधर सकता है। वहीं, विलफुल डिफॉल्टर घोषित होते ही व्यक्ति और उसकी कंपनियों का नाम आरबीआई तथा सभी क्रेडिट ब्यूरो (CIBIL, Experian, Equifax) की सार्वजनिक विलफुल डिफॉल्टर लिस्ट में चला जाता है; इसके बाद पूरे देश का कोई भी बैंक या एनबीएफसी अगले 5 वर्षों तक उसे कोई नया लोन या क्रेडिट सुविधा जारी नहीं कर सकता।

  5. कारोबारी, संवैधानिक और यात्रा पाबंदियां (Corporate Governance and Legal Restrictions): सामान्य डिफॉल्टर किसी कंपनी में निदेशक (Director) के पद पर काम कर सकता है और उस पर कोई व्यक्तिगत पाबंदी नहीं होती। दूसरी ओर, विलफुल डिफॉल्टर घोषित होने पर कंपनी लॉ के तहत वह व्यक्ति किसी भी कंपनी के निदेशक पद के लिए अयोग्य हो जाता है, उसे पूंजी बाजार (SEBI) से धन जुटाने पर आजीवन प्रतिबंध झेलना पड़ सकता है और गंभीर मामलों में देश छोड़कर भागने से रोकने के लिए उसके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर (LOC) जारी कर पासपोर्ट जब्त किया जा सकता है।

कोई भी बैंक या वित्तीय संस्थान अपनी मर्जी से या किसी एक बैंक मैनेजर के कहने पर किसी ग्राहक को रातों-रात विलफुल डिफॉल्टर घोषित नहीं कर सकता। इसके लिए आरबीआई ने एक बेहद सख्त, पारदर्शी और बहु-स्तरीय प्रक्रिया निर्धारित की है ताकि किसी भी ईमानदार ग्राहक का शोषण न हो। सबसे पहले बैंक की एक आंतरिक जांच समिति (Identification Committee) कर्जदार के खातों, बैलेंस शीट और बैंक ट्रांजैक्शंस का फॉरेंसिक ऑडिट करती है। यदि समिति को यह पुख्ता सबूत मिलते हैं कि फंड का दुरुपयोग हुआ है या जानबूझकर भुगतान रोका गया है, तो कर्जदार को एक विस्तृत ‘कारण बताओ नोटिस’ (Show Cause Notice) भेजा जाता है। इस नोटिस में स्पष्ट रूप से कारण लिखे होते हैं और ग्राहक को अपना पक्ष, वित्तीय प्रमाण और जवाब पेश करने के लिए 15 से 30 दिनों का अनिवार्य समय दिया जाता है। यदि ग्राहक व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपना पक्ष रखना चाहता है, तो उसे निष्पक्ष सुनवाई का पूरा अवसर मिलता है। इसके बाद, बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) या एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर की अध्यक्षता वाली एक उच्चस्तरीय स्वतंत्र ‘रिव्यू कमेटी’ (Review Committee) पूरे मामले और ग्राहक के जवाब का दोबारा मूल्यांकन करती है। केवल तभी, जब रिव्यू कमेटी सभी सबूतों से पूर्णतः संतुष्ट हो जाए कि डिफ़ॉल्ट सुनियोजित और दुर्भावनापूर्ण है, उस व्यक्ति को औपचारिक रूप से विलफुल डिफॉल्टर के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

यदि आप किसी वास्तविक वित्तीय मजबूरी, नौकरी छूटने या व्यापारिक घाटे के चलते अपनी लोन की किश्तें नहीं भर पा रहे हैं, तो बैंक के नोटिसों से डरकर छिपने या फोन बंद करने के बजाय सक्रिय रुख अपनाना सबसे सुरक्षित रास्ता है। सबसे पहले, अपनी वित्तीय स्थिति के प्रामाणिक दस्तावेज (जैसे जॉब टर्मिनेशन लेटर, मेडिकल रिपोर्ट या घाटे का ब्योरा) लेकर तुरंत अपने होम ब्रांच मैनेजर या बैंक के लोन रिकवरी विभाग से संपर्क करें। बैंक से लोन रीस्ट्रक्चरिंग (Restructuring) का लिखित अनुरोध करें, जिसके तहत बैंक आपके लोन का कार्यकाल (Tenure) बढ़ाकर मासिक ईएमआई को काफी कम कर सकता है। यदि संकट अस्थायी है, तो आप 3 से 6 महीने का ‘मोराटोरियम’ (Moratorium) या ईएमआई हॉलिडे मांग सकते हैं, जिससे आपको नई नौकरी या आय का जरिया तलाशने का समय मिल जाता है। यदि स्थिति ऐसी है कि आप कर्ज चुकाने में पूरी तरह असमर्थ हैं, तो बैंक से ‘वन टाइम सेटलमेंट’ (OTS) पर चर्चा की जा सकती है। याद रखें कि कानून हमेशा एक ईमानदार लेकिन परेशान कर्जदार को राहत और सुरक्षा प्रदान करता है; जब तक आपकी नीयत में कोई बेईमानी या कपट नहीं है, तब तक आपको विलफुल डिफॉल्टर की श्रेणी में कभी नहीं डाला जा सकता।