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‘सिर्फ सरकारी खजाने से नहीं बनेगा विकसित भारत’: मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन की खरी सलाह, राज्यों को दिया 3 सूत्रीय फॉर्मूला

भारत को साल 2047 तक एक पूर्ण विकसित राष्ट्र बनाने के राष्ट्रीय संकल्प को हासिल करने के लिए केंद्र सरकार ने देश के आर्थिक ढांचे को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और यथार्थवादी नीतिगत रुख स्पष्ट किया है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय के तत्वावधान में आयोजित एक उच्चस्तरीय अंतर-राज्यीय वित्तीय सम्मेलन के दौरान देश के शीर्ष नीति निर्धारकों ने दो-टूक शब्दों में साफ कर दिया है कि ‘विकसित भारत’ का विशालकाय और महत्वाकांक्षी लक्ष्य केवल सरकारी खजाने से किए जाने वाले सार्वजनिक खर्च के दम पर किसी भी सूरत में हासिल नहीं किया जा सकता। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी एक आधिकारिक बयान के अनुसार, भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (Chief Economic Advisor) डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन ने शनिवार को राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के वित्त मंत्रियों, प्रमुख सचिवों और शीर्ष नीति निर्माताओं को संबोधित करते हुए निजी पूंजी (Private Investment) की व्यापक और निर्णायक भागीदारी को समय की सबसे बड़ी मांग करार दिया। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने रेखांकित किया कि यद्यपि भारत का घरेलू बचत आधार (Savings Base) वैश्विक मानकों के हिसाब से काफी मजबूत है और इसे आगे भी बढ़ाने के निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए, लेकिन आगामी दशकों में देश के बुनियादी ढांचे, विनिर्माण और औद्योगिक आधुनिकीकरण के लिए जितने भारी पूंजीगत निवेश की दरकार है, उसकी पूर्ति निजी क्षेत्र की सक्रिय और आक्रामक वित्तीय भागीदारी के बिना संभव नहीं है।

मुख्य आर्थिक सलाहकार से पहले शुक्रवार को आयोजित सत्र में आर्थिक मामलों के विभाग (Department of Economic Affairs – DEA) की सचिव अनुराधा ठाकुर ने भी इसी आर्थिक यथार्थ पर गहरा प्रकाश डाला था। वित्त मंत्रालय के संयुक्त बयान के मुताबिक, डीईए सचिव ने स्पष्ट किया कि विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए देश की अर्थव्यवस्था को जिस संरचनात्मक और तकनीकी परिवर्तन से गुजरना है, उसका पूरा वित्तीय बोझ अकेला केंद्रीय या राज्य बजट नहीं उठा सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि पारंपरिक बजटीय आवंटन की सीमाओं से बाहर निकलकर निजी क्षेत्र से पूंजी प्रवाह को सुगम बनाना, अभिनव वित्तीय साधन (Innovative Financing Instruments), सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड्स, म्युनिसिपल बॉन्ड्स, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) के आधुनिक मॉडल और सरकार के विभिन्न स्तरों—केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों—के बीच एक सहज नीतिगत समन्वय स्थापित करना ही भारत की तीव्र आर्थिक प्रगति की वास्तविक आधारशिला बनेगा।

अपनी तरह के इस अनूठे और पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में राज्यों के साथ संवाद स्थापित करते हुए सीईए डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन ने एक बेहद प्रभावशाली मंत्र साझा किया कि “विकसित भारत का पूरा अस्तित्व पूरी तरह से विकसित राज्यों पर निर्भर करता है।” उन्होंने कहा कि जब तक राज्य स्तर पर निवेश की गति तेज नहीं होगी, तब तक राष्ट्रीय स्तर पर जीडीपी वृद्धि की रफ्तार को दीर्घकालिक रूप से 8 प्रतिशत से ऊपर बनाए रखना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। नागेश्वरन ने राज्य सरकारों को व्यावहारिक सुझाव देते हुए कहा कि राज्यों द्वारा अपनाए गए सर्वोत्तम तौर-तरीकों (Best Practices), नियमों को सरल और व्यापार-अनुकूल बनाने की दिशा में जारी प्रयासों और विभिन्न आर्थिक विशेषज्ञ समितियों द्वारा दी गई सिफारिशों को केवल विचार-विमर्श तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें स्पष्ट जिम्मेदारियों, सुदृढ़ प्रशासनिक जवाबदेही और तय समय-सीमा वाले संस्थागत समझौतों में तब्दील किया जाना चाहिए। उन्होंने वैश्विक परिदृश्य का उल्लेख करते हुए चेतावनी दी कि अगले पांच वर्षों के भीतर जब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में पूंजी और फाइनेंसिंग के अभूतपूर्व अवसर उपलब्ध हैं, तब भारत को आंतरिक स्तर पर संसाधन जुटाने की गति को कई गुना बढ़ाना होगा ताकि देश अपनी लंबी अवधि की विकास यात्रा को बिना किसी वित्तीय अवरोध के निर्बाध गति से जारी रख सके।

देश के मुख्य अर्थशास्त्री ने राज्य सरकारों के वित्तीय और प्रशासनिक नेतृत्व के समक्ष तीन बुनियादी और अपरिहार्य प्राथमिकताएं प्रस्तुत कीं, जिन पर तुरंत काम शुरू करने की आवश्यकता है:

  • निजी पूंजी के लिए पारदर्शी और सुगम माहौल का निर्माण: राज्यों को अपने यहां उद्योग और विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए उपयुक्त औद्योगिक भूमि (Land Banks), निरंतर और किफायती गुणवत्तापूर्ण बिजली (Power Supply) और आधुनिक लॉजिस्टिक्स बुनियादी ढांचे की उपलब्धता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। इसके साथ ही, विनियामक बाधाओं को पूरी तरह समाप्त करने के लिए सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम को पूरी तरह पारदर्शी, फेसलेस और समयबद्ध बनाना अनिवार्य है ताकि किसी भी निजी निवेशक को सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें।

  • परियोजनाओं की गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय फंडिंग की तैयारी: राज्यों को अपनी परियोजनाओं की तैयारी पाइपलाइन (Project-Preparation Pipeline) को अत्यधिक पेशेवर और पारदर्शी बनाना चाहिए। त्रुटिरहित और आर्थिक रूप से व्यावहारिक डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट्स (DPRs) तैयार की जानी चाहिए, जिससे कि घरेलू बैंकिंग संस्थानों के साथ-साथ विश्व बैंक (World Bank), एशियाई विकास बैंक (ADB) और एआईआईबी (AIIB) जैसी बहुपक्षीय वित्तीय संस्थाओं (Multilateral Agencies) से रियायती दरों पर बड़े पैमाने पर दीर्घकालिक पूंजी आकर्षित की जा सके।

  • क्रेडिट से वंचित आकांक्षी जिलों में वित्तीय विस्तार: राज्यों को विकास की अपार संभावनाएं समेटे हुए उन दूरदराज और ग्रामीण जिलों तक औपचारिक संस्थागत ऋण (Institutional Credit) का दायरा तेजी से पहुंचाना होगा, जो अब तक मुख्यधारा की बैंकिंग सुविधाओं और पूंजी प्रवाह से वंचित रहे हैं। वित्तीय विषमता को दूर करने के लिए बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) के साथ मिलकर विशेष क्रेडिट योजनाओं को धरातल पर उतारना आवश्यक है।

राज्यों के सामने मौजूद राजकोषीय दबावों और बजटीय सीमाओं को स्वीकार करते हुए भी मुख्य आर्थिक सलाहकार ने राज्यों से अपील की कि वे अपने पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure/Capex) को किसी भी कीमत पर कम न होने दें। डॉ. नागेश्वरन ने स्पष्ट आर्थिक लक्ष्य निर्धारित करते हुए कहा कि सभी राज्यों को अपने पूंजीगत खर्च को वित्त वर्ष 2031-32 तक अपने संबंधित सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के मौजूदा लगभग 2.4 प्रतिशत के स्तर से बढ़ाकर कम से कम 3 प्रतिशत तक ले जाना चाहिए। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यों द्वारा पूंजीगत परिसंपत्तियों—जैसे सड़कें, आधुनिक सिंचाई नेटवर्क, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, कोल्ड स्टोरेज और औद्योगिक पार्कों—के निर्माण पर खर्च किया गया एक-एक रुपया अर्थव्यवस्था में कई गुना गुणक प्रभाव (Multiplier Effect) पैदा करता है, जो अंततः निजी क्षेत्र को भारी निवेश करने के लिए प्रेरित करता है और युवाओं के लिए करोड़ों स्थायी रोजगार के अवसरों का सृजन करता है।