
भारतीय राजनीतिक के गलियारों में प्रशांत किशोर उर्फ पीके ने एक बार फिर अपनी रणनीतिक क्षमता का लोहा मनवा लिया है। महज एक साल पहले, यानी 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जिन प्रशांत किशोर की ‘जनसुराज पार्टी’ के सभी उम्मीदवारों को करारी हार का सामना करना पड़ा था और 236 प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई थी, उसी पार्टी ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में शानदार जीत हासिल कर तहलका मचा दिया है। इस सीट पर पिछले तीन दशकों से भारतीय जनता पार्टी का एकछत्र राज था, जिसे पीके ने अपनी दूरदर्शिता और जनता के बीच सीधी पैठ बनाकर ध्वस्त कर दिया है।
2014 से शुरू हुआ चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बनने का सफर
प्रशांत किशोर का राजनीतिक सफर बेहद दिलचस्प रहा है। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए सफल चुनावी रणनीति तैयार करने के बाद वह सुर्खियों में आए थे। इसके बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक रणनीतिकार कंपनी ‘आई-पैक’ (I-PAC) की नींव रखी और देश के कई प्रमुख दलों के लिए काम किया। साल 2018 में वह जनता दल यूनाइटेड (JDU) में शामिल हुए और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ सीएए और एनआरसी जैसे मुद्दों पर वैचारिक मतभेदों के चलते साल 2020 में उन्हें पार्टी से अलग होना पड़ा। इसके बाद उन्होंने किसी अन्य दल में शामिल होने के बजाय खुद की राजनीतिक जमीन तैयार करने का फैसला किया।
जनसुराज का गठन, पदयात्रा और बिहार के बुनियादी मुद्दे
नीतीश कुमार से राहें जुदा होने के बाद प्रशांत किशोर ने बिहार की सियासत में बदलाव लाने के लिए ‘जन सुराज’ अभियान की शुरुआत की और पूरे राज्य में लंबी पदयात्रा निकाली। उन्होंने अपनी रैलियों और सभाओं में पारंपरिक जातिगत समीकरणों से हटकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बिहार से होने वाले पलायन जैसे असली मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाया। साल 2024 में इस संगठन को औपचारिक रूप से एक राजनीतिक दल में बदल दिया गया, ताकि बिहार की जनता को एक मजबूत और नया राजनीतिक विकल्प मिल सके, जो राज्य की दशा और दिशा बदल सके।
2025 के विधानसभा चुनाव में मिली थी बड़ी असफलता और सबक
साल 2025 के विधानसभा चुनाव में जनसुराज पार्टी ने कुल 243 में से 238 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। हालांकि, पार्टी के लिए यह चुनाव किसी झटके से कम नहीं रहा, क्योंकि न केवल उनका खाता खुला बल्कि उनके 236 उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जमीनी स्तर पर मजबूत कार्यकर्ताओं की कमी, पार्टी की नई पहचान और खुद प्रशांत किशोर का चुनाव मैदान में न उतरना इस हार की मुख्य वजहें बनीं, जिससे जनता के सामने कोई बड़ा स्थानीय चेहरा प्रोजेक्ट नहीं हो पाया था।
बांकीपुर उपचुनाव में कैसे पलटी बाजी और ढहा बीजेपी का गढ़
बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुआ उपचुनाव पिछले आम चुनावों से बिल्कुल अलग साबित हुआ। यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के राज्यसभा सांसद बनने के बाद खाली हुई थी, जहाँ तीन दशक से भगवा दल का कब्जा था। इस उपचुनाव में जनता का सीधा संवाद प्रशांत किशोर के साथ स्थापित हुआ और मतदाताओं ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से एक मजबूत विकल्प के रूप में स्वीकार किया। इसके अलावा, हालिया युवा आंदोलनों और बदलाव की बयार ने भी मतदाताओं को सोचने पर मजबूर किया। प्रशांत किशोर की इस पहली चुनावी जीत ने यह साबित कर दिया है कि वह बिहार की राजनीति में लंबी रेस के घोड़े हैं।
girls globe