यूपी सूचना विभाग में विज्ञापन का बड़ा ‘खेल’: पीसीएस अधिकारी अनुराग प्रसाद पर गंभीर आरोप, स्थानीय पब्लिशर्स में भारी आक्रोश

उत्तर प्रदेश के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (Information and Public Relations Department) से एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर मामला सामने आया है। विभाग के वेब मीडिया विंग में तैनात पीसीएस अधिकारी और मीडिया प्रभारी अनुराग प्रसाद की कार्यप्रणाली को लेकर पब्लिशर्स और मीडिया जगत में गहरा असंतोष है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, विभाग के भीतर इन दिनों पारदर्शिता को ताक पर रखकर कथित तौर पर मनमर्जी और भ्रष्टाचार का खेल चलाया जा रहा है।

स्थानीय मीडिया संगठनों और पब्लिशर्स का आरोप है कि जो अधिकारी उत्तर प्रदेश के मीडिया को मजबूत करने के लिए जिम्मेदार हैं, वही अब यूपी के पब्लिशर्स के हितों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

यूपी के पब्लिशर्स की अनदेखी, दिल्ली और अन्य राज्यों पर मेहरबानी

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा कारण विज्ञापन (Government Advertisements) के आवंटन में किया जा रहा कथित पक्षपात है। उत्तर प्रदेश के छोटे और मध्यम पब्लिशर्स, जो दिन-रात जमीन पर रहकर सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाते हैं, उन्हें विज्ञापन के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिल रहा है।

विज्ञापनों के इस कथित असमान वितरण को आप नीचे दी गई तालिका से समझ सकते हैं:

पब्लिशर्स का सीधा आरोप है कि पीसीएस अधिकारी अनुराग प्रसाद जानबूझकर यूपी के पब्लिशर्स को दरकिनार कर बाहरी राज्यों की कंपनियों और पब्लिशर्स को फायदा पहुंचा रहे हैं।

बंद कमरे में घंटों बैठक, आम पब्लिशर्स के लिए समय नहीं

सूत्रों के हवाले से जो जानकारियां सामने आ रही हैं, वे विभाग के प्रशासनिक माहौल पर भी गंभीर सवाल खड़े करती हैं। आरोप है कि दफ्तर में आने वाले आम और जरूरतमंद पब्लिशर्स से बात करने के लिए मीडिया प्रभारी के पास दो मिनट का समय भी नहीं होता है। वे अपनी समस्याओं को लेकर हफ्तों चक्कर काटते रहते हैं।

इसके विपरीत, सूत्रों का दावा है कि यदि कोई महिला या प्रभाव रखने वाले लोग मिलने आते हैं, तो उनके साथ बंद कमरे के भीतर दो से तीन घंटे लंबी बैठकें की जाती हैं। आम मीडियाकर्मियों के प्रति इस तरह का उदासीन और चयनात्मक (Selective) रवैया अधिकारियों की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा करता है।

खुलेआम घूसखोरी और लेनदेन की चर्चा

विभागीय सूत्रों के अनुसार, विज्ञापन देने के इस पूरे तंत्र के पीछे कथित तौर पर भारी लेनदेन और घूसखोरी का खेल चल रहा है। आरोप है कि जो लोग तय ‘कमीशन’ या रिश्वत देने को तैयार हैं, उनके विज्ञापनों को तुरंत मंजूरी मिल जाती है, जबकि ईमानदारी से काम करने वाले पब्लिशर्स की फाइलें महीनों तक दबाकर रखी जाती हैं।

इस तरह के भ्रष्टाचार से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance against Corruption) के दावों को भी ठेस पहुंच रही है। पब्लिशर्स के संगठनों ने अब इस मामले को लेकर उच्च स्तर पर शिकायत दर्ज कराने और पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच (Vigilance Inquiry) कराने की मांग शुरू कर दी है, ताकि स्थानीय मीडियाकर्मियों को उनका हक मिल सके।