India-US Trade Deal: 90% काम पूरा होने के बाद भी क्यों अटका है महासमझौता? समझिए इसके पीछे की पूरी इनसाइड स्टोरी

भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चली आ रही आर्थिक तनातनी और ट्रेड डील (व्यापार समझौता) अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी है। हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री ने खुद बयान दिया था कि इस महाडील का करीब 90 फीसदी काम पूरा हो चुका है और बहुत जल्द दोनों देश इस पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। यह समझौता दोनों देशों की अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर माना जा रहा है।

लेकिन इस पूरी बातचीत के पीछे पर्दे के पीछे की एक ऐसी कहानी है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इस पूरी ट्रेड डील को प्रभावित करने और दोनों देशों को बातचीत की मेज पर लाने में अमेरिकी ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 (Section 301) की सबसे बड़ी भूमिका रही है। आइए बहुत ही आसान शब्दों में समझते हैं कि आखिर यह कानून क्या है और भारत के लिए इसके क्या मायने हैं।

क्या है अमेरिकी ट्रेड एक्ट की धारा 301?

अमेरिकी ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 को तकनीकी भाषा में ‘रिलीफ फ्रॉम अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिसेज’ (Relief from Unfair Trade Practices) कहा जाता है। सीधे शब्दों में कहें तो यह अमेरिकी सरकार को मिला एक ऐसा कानूनी डंडा है, जिसका इस्तेमाल वह दुनिया के किसी भी देश के खिलाफ कर सकती है।

 कानून की मुख्य परिभाषा

यह धारा अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधियों (USTR) को यह असीमित अधिकार देती है कि वे दुनिया के किसी भी ऐसे देश की नीतियों, नियमों या कानूनों की जांच कर सकते हैं, जो अमेरिकी कंपनियों के हितों को नुकसान पहुंचाते हैं। अगर अमेरिका को लगता है कि किसी देश का व्यापार कानून अनुचित, भेदभावपूर्ण या अव्यावहारिक है और उससे अमेरिकी उत्पादों, सेवाओं या निवेश (Investment) को घाटा हो रहा है, तो अमेरिका उसके खिलाफ सख्त कदम उठा सकता है।

वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (WTO) के बाहर भी एकतरफा ताकत

इस कानून की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह अमेरिका को विश्व व्यापार संगठन (WTO) के अंतरराष्ट्रीय नियमों के बाहर जाकर भी एकतरफा कार्रवाई (Unilateral Action) करने की छूट देता है।

आमतौर पर दो देशों के व्यापारिक विवादों का फैसला WTO करता है, लेकिन धारा 301 के तहत अमेरिका किसी की परवाह किए बिना सीधे सामने वाले देश पर भारी-भरकम टैक्स (टैरिफ) थोप सकता है या पुराने व्यापारिक फायदों को वापस ले सकता है। अमेरिका ने इतिहास में इस कानून का सबसे घातक और सबसे ज्यादा इस्तेमाल चीन के खिलाफ किया है।

साल 2026 में भारत पर क्यों शुरू हुई जांच?

इस कानून का भारत से क्या कनेक्शन है, इसे समझने के लिए हमें इस साल के घटनाक्रम को देखना होगा। इसी साल 2026 में अमेरिका ने धारा 301(बी) के तहत भारत सहित दुनिया के 16 प्रमुख देशों के खिलाफ एक बड़ी जांच शुरू की थी। इस लिस्ट में भारत के अलावा चीन, यूरोपीय यूनियन, जापान, दक्षिण कोरिया और वियतनाम जैसे बड़े नाम शामिल थे।

अमेरिका ने भारत के व्यापार मॉडल को लेकर कुछ गंभीर आपत्तियां जताई थीं, जिन्हें आप नीचे दी गई तालिका से समझ सकते हैं:

भारत के लिए क्यों नाक का सवाल बना यह कानून?

मौजूदा समय में चल रही भारत-अमेरिका ट्रेड डील असल में इसी कानून के इर्द-गिर्द घूम रही है। भारत के लिए इस कानून के निहितार्थ बहुत बड़े हैं:

  1. भारी जुर्माने और टैरिफ का डर: यदि इस जांच में भारत की नीतियां दोषी पाई जाती हैं, तो अमेरिका भारतीय सामानों पर भारी टैक्स लगा देगा। ऐसा होने से अमेरिका के बाजारों में भारत का कपड़ा, इंजीनियरिंग सामान और दवाइयां (Pharma) महंगी हो जाएंगी और हमारा निर्यात ठप हो सकता है।

  2. पड़ोसी देशों से मुकाबले की चुनौती: भारत चाहता है कि इस डील के तहत उसे धारा 301 की जांच और किसी भी संभावित टैरिफ से हमेशा के लिए पूरी राहत मिल जाए। भारत अमेरिका से ज्यादा से ज्यादा व्यापारिक छूट की मांग कर रहा है ताकि वह अमेरिकी बाजार में वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों का मुकाबला कर सके।

  3. अमेरिका का दबाव बनाने का हथियार: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कुछ पुराने व्यक्तिगत टैरिफ फैसलों को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवैध घोषित किए जाने के बाद, अब अमेरिकी प्रशासन के पास ‘धारा 301’ ही सबसे बड़ा और वैध कानूनी हथियार बचा है। यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को इतनी शक्ति देता है कि उन्हें किसी भी देश पर टैक्स लगाने के लिए अपनी संसद (कांग्रेस) की मंजूरी की जरूरत नहीं पड़ती।

डील का असली पेंच: वर्तमान में अमेरिका इसी कानून का डर दिखाकर भारत पर दबाव बना रहा है कि भारत अपने कृषि (Agriculture), डेयरी (Dairy) और आईटी (IT) सेक्टर्स को अमेरिकी कंपनियों के लिए पूरी तरह खोल दे और उन्हें ज्यादा एक्सेस दे। वहीं, भारतीय रणनीतिकार इस कोशिश में हैं कि बिना अपने किसानों और स्थानीय हितों को नुकसान पहुंचाए, किसी तरह अमेरिका के इस ‘धारा 301’ वाले जाल से सुरक्षित बाहर निकला जाए। यही वजह है कि 90% काम होने के बाद भी आखिरी 10% की बातचीत में दोनों देश फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।