घर खरीदारों की बड़ी जीत: फ्लैट मिलने में हुई देरी तो पंजाब रेरा ने बिल्डर पर ठोका ₹25 लाख का जुर्माना, कहा- खरीदारों के हक अटूट

अपना खुद का एक घर होना हर इंसान का सबसे बड़ा सपना होता है। इसके लिए लोग अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी दांव पर लगा देते हैं। लेकिन जब भारी-भरकम भुगतान करने के बाद भी बिल्डर समय पर घर का कब्जा नहीं देते, तो खरीदार पूरी तरह टूट जाता है। ऐसे ही एक मामले में पंजाब रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (P-RERA) ने घर खरीदारों के पक्ष में एक बेहद नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है।

प्राधिकरण ने साफ कर दिया है कि रियल एस्टेट परियोजनाओं में निवेश करने वाले आम लोगों के अधिकार पूरी तरह सुरक्षित हैं और किसी भी परिस्थिति में उनके साथ समझौता नहीं किया जा सकता। रेरा ने न्यू चंडीगढ़ के एक बिल्डर को फ्लैट सौंपने में हुई देरी के एवज में आवंटी को करीब 25 लाख रुपये का ब्याज देने का कड़ा आदेश जारी किया है।

क्या है पूरा मामला?

चंडीगढ़ के सेक्टर-12 स्थित पीईसी (PEC) परिसर की रहने वाली नीलम अरोड़ा ने न्यू चंडीगढ़ में चल रही ‘द लेक’ (The Lake) नाम की एक आवासीय परियोजना में अपने लिए एक फ्लैट बुक कराया था। इस फ्लैट की कुल कीमत 74.75 लाख रुपये से अधिक थी।

शिकायतकर्ता के वकील एम. शाहनवाज खान ने रेरा के सामने पक्ष रखते हुए बताया कि खरीदार ने ‘एकमुश्त भुगतान योजना’ (Lump-sum Payment Plan) के तहत फ्लैट बुकिंग के शुरुआती 90 दिनों के भीतर ही कुल रकम का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा बिल्डर को ईमानदारी से जमा करा दिया था। इतनी बड़ी रकम मिलने के बाद भी बिल्डर का रवैया बेहद सुस्त रहा। उसने लंबे समय तक खरीदार समझौता (Buyer’s Agreement) तक साइन नहीं किया। आखिरकार 26 दिसंबर 2022 को एग्रीमेंट तैयार हुआ, जिसमें फ्लैट का कब्जा देने की आखिरी तारीख 31 जुलाई 2023 तय की गई थी। जब यह समय सीमा भी बीत गई और फ्लैट नहीं मिला, तब परेशान होकर खरीदार ने रेरा का दरवाजा खटखटाया।

द लेक प्रोजेक्ट विवाद: एक नजर में पूरा ब्योरा

इस पूरे मामले और रेरा के आदेश को आप नीचे दी गई तालिका से आसानी से समझ सकते हैं:

रेरा ने बिल्डर के कोरोना और सरकारी मंजूरियों के बहानों को नकारा

सुनवाई के दौरान बिल्डर ने खुद को बचाने के लिए अदालतों में अक्सर दिए जाने वाले घिसे-पिटे बहानों का सहारा लिया। बिल्डर के वकीलों ने तर्क दिया कि कोविड-19 महामारी के कारण काम रुक गया था, विभिन्न सरकारी विभागों से मंजूरियां मिलने में देरी हुई और कई प्रशासनिक अड़चनें सामने आईं, जिसके कारण प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं हो सका।

हालांकि, रेरा के सदस्य अरुणवीर वशिष्ठ की पीठ ने बिल्डर की इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। पीठ ने अपने आदेश में बेहद सख्त लहजे में कहा कि किसी भी खरीदार को अपनी गाढ़ी कमाई फंसाने के बाद अनिश्चितकाल तक फ्लैट मिलने का इंतजार करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के नियमों का हवाला

प्राधिकरण ने अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) द्वारा तय किए गए सिद्धांतों का जिक्र करते हुए माना कि ऐसे प्रोजेक्ट्स में बुकिंग के बाद 3 साल की अवधि को घर सौंपने के लिए पर्याप्त और उचित माना जा सकता है। चूंकि इस मामले में अलॉटमेंट लेटर दिसंबर 2018 में ही जारी हो गया था, इसलिए तकनीकी रूप से फ्लैट का कब्जा अधिकतम 14 दिसंबर 2021 तक हर हाल में मिल जाना चाहिए था।

पैसा नहीं दिया तो भू-राजस्व की तरह होगी वसूली

रेरा की पीठ ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यदि बिल्डर तय समय के भीतर खरीदार को ब्याज की यह राशि नहीं चुकाता है, तो इस पैसे की वसूली भू-राजस्व बकाया (Land Revenue Arrears) की तरह कड़ाई से की जाएगी। यानी प्रशासन बिल्डर की संपत्ति कुर्क करके भी खरीदार का पैसा वापस दिलाएगा। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब अंतिम गणना के आधार पर पीड़ित परिवार को करीब 25 लाख रुपये के आसपास ब्याज मिलना पूरी तरह तय हो गया है। रेरा का यह रुख पंजाब और चंडीगढ़ के उन तमाम बिल्डरों के लिए एक कड़ी चेतावनी है जो पैसे लेने के बाद सालों-साल प्रोजेक्ट को लटका कर रखते हैं।