
आज से करीब दो दशक पहले भारत के आसमान में एक अजीब सा सन्नाटा पसरने लगा था। हमारे पर्यावरण के सबसे बड़े और प्राकृतिक सफाईकर्मी यानी गिद्ध (Vultures) धीरे-धीरे आसमान से पूरी तरह ओझल होने लगे थे। जहरीली दवाओं और इंसानी लापरवाही के कारण यह प्रजाति लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गई थी। लेकिन अब वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों के लिए एक बेहद सुकून देने वाली खबर सामने आ रही है।
कैद में प्रजनन (Captive Breeding) और चरणबद्ध तरीके से उन्हें दोबारा जंगलों में बसाने के कार्यक्रमों की बदौलत देश में 700 से अधिक गिद्धों की सुरक्षित वापसी हो रही है। इस पूरे महाअभियान में देश के सुरक्षित बाघ अभयारण्य (Tiger Reserves) इन गिद्धों के लिए नए और सबसे सुरक्षित ठिकाने बनकर उभरे हैं। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (BNHS) और विभिन्न राज्य सरकारों के नेतृत्व में संकटग्रस्त सफेद-पीठ वाले और लंबी-पतली चोंच वाले गिद्धों की पुनर्बहाली का यह प्रोजेक्ट अब अपने सबसे महत्वपूर्ण और सफल चरण में पहुंच चुका है।
एक दर्दनाक इतिहास: क्यों अचानक गायब हो गए थे गिद्ध?
बात 1999 की है, जब बीएनएचएस (BNHS) ने पहली बार भारतीय उपमहाद्वीप में गिद्धों की आबादी में अचानक आई भारी गिरावट को दर्ज किया। इसके बाद हुए वैज्ञानिक अनुसंधानों में एक बेहद चौंकाने वाला और कड़वा सच सामने आया।
मवेशियों (विशेषकर गाय और भैंस) के इलाज में दी जाने वाली एक साधारण सी दर्द निवारक और सूजनरोधी दवा ‘डाइक्लोफेनाक’ (Diclofenac) इस तबाही की मुख्य विलेन निकली। जब इस दवा से इलाज कराने वाले किसी मवेशी की मौत हो जाती थी और गिद्ध उसके शव को खाते थे, तो यह दवा उनके शरीर में पहुंचकर उनके गुर्दों (Kidneys) को पूरी तरह फेल कर देती थी। इस खोज के बाद साल 2006 में सरकार ने पशु-चिकित्सा में डाइक्लोफेनाक के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद केटोप्रोफेन, एसेक्लोफेनाक और निमेसुलाइड जैसी अन्य हानिकारक दवाओं पर भी कड़ा एक्शन लिया गया।
जटायु संरक्षण केंद्रों से मिली नई जिंदगी
गिद्धों को पूरी तरह खत्म होने से बचाने के लिए बीएनएचएस और राज्य वन विभागों ने ‘रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स’ (RSPB) के साथ मिलकर देश के चार अलग-अलग हिस्सों में विशेष संरक्षण और प्रजनन केंद्र स्थापित किए।
वर्तमान में इन केंद्रों की स्थिति और उनकी सफलता को आप नीचे दी गई तालिका से आसानी से समझ सकते हैं:
| संरक्षण केंद्र का नाम (Location) | राज्य (State) | वर्तमान स्थिति और सफलता (Current Status) |
| पिंजौर केंद्र | हरियाणा | यहां छोड़े गए सफेद-पीठ वाले गिद्ध अब पूरी तरह प्राकृतिक रूप से जंगलों में अंडे दे रहे हैं और प्रजनन कर रहे हैं। |
| राजाभातखावा केंद्र | पश्चिम बंगाल | यहां से छोड़े गए 31 गिद्ध अब सुरक्षित रूप से भारत, नेपाल और भूटान की सीमाओं तक अपनी उड़ान भर रहे हैं। |
| रानी केंद्र | असम | पूर्वोत्तर भारत में गिद्धों की स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण और उनकी संख्या बढ़ाने का मुख्य केंद्र। |
| भोपाल केंद्र | मध्य प्रदेश | मध्य भारत के जंगलों में गिद्धों की आबादी को दोबारा संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका। |
इन चारों केंद्रों में वर्तमान में 740 गिद्ध पूरी तरह सुरक्षित माहौल में रह रहे हैं। इस पूरे कार्यक्रम के तहत अब तक विभिन्न राज्यों को 80 गिद्ध उपलब्ध कराए जा चुके हैं और लगभग 110 गिद्धों को सफलतापूर्वक खुले जंगलों में आज़ाद किया जा चुका है।
टाइगर रिजर्व क्यों बन रहे हैं गिद्धों के लिए ‘सेफ हेवन’?
हाल के वर्षों में वन्यजीव वैज्ञानिकों का पूरा ध्यान इन छोड़े गए गिद्धों को सुरक्षित रखने के लिए बाघ अभयारण्यों (Tiger Reserves) पर केंद्रित हुआ है। इसके पीछे दो मुख्य और बेहद तार्किक कारण हैं:
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हानिकारक दवाओं से मुक्ति: टाइगर रिजर्व के भीतर इंसानी दखल और पालतू मवेशियों का आना-जाना पूरी तरह प्रतिबंधित होता है। इस वजह से वहां मिलने वाले मृत जानवरों में जहरीली पशु-चिकित्सा दवाओं के अंश होने का खतरा बिल्कुल शून्य होता है।
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प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक भोजन: इन घने जंगलों में चीतल, सांभर और जंगली सूअर जैसे शाकाहारी जीवों की भारी संख्या होती है। बाघों द्वारा शिकार किए जाने के बाद बचे हुए शव (Leftover Carcasses) गिद्धों के लिए भोजन का सबसे शुद्ध और प्राकृतिक स्रोत बनते हैं।
महाराष्ट्र इस समय गिद्धों के पुनर्वास का एक बहुत बड़ा गढ़ बनकर उभरा है, जहां पेंच, ताडोबा-अंधारी और मेलघाट जैसे मशहूर बाघ अभयारण्यों में इन पक्षियों को छोड़ा जा रहा है।
जीपीएस ट्रैकर से खुले हैरान करने वाले राज
बीएनएचएस के निदेशक किशोर रिठे के मुताबिक, जंगलों में छोड़े जा रहे गिद्धों की गतिविधियों और उनकी सेहत पर नजर रखने के लिए उनके शरीर पर जीपीएस (GPS) और जीएसएम (GSM) ट्रांसमीटर लगाए जा रहे हैं। इसके जो नतीजे आ रहे हैं, वे वैज्ञानिकों को रोमांचित कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, पेंच टाइगर रिजर्व से छोड़े गए लंबी चोंच वाले एक गिद्ध ने केवल 17 दिनों के भीतर 750 किलोमीटर की लंबी दूरी तय की और वह महाराष्ट्र के नासिक तक जा पहुंचा। सबसे सुखद बात यह है कि अब तक छोड़े गए किसी भी गिद्ध की मौत उन जहरीली दवाओं के कारण नहीं हुई है, जिन्होंने कभी इनकी पूरी नस्ल को खत्म कर दिया था।
आगे की राह और हमारी जिम्मेदारी
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि इस ऐतिहासिक प्रोजेक्ट की दीर्घकालिक सफलता सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं रह सकती। अगर हमें अपने आसमान में इन खूबसूरत पक्षियों को हमेशा के लिए वापस लाना है, तो संरक्षित क्षेत्रों से बाहर भी ग्रामीण इलाकों में मवेशियों के इलाज के लिए केवल सुरक्षित दवाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देना होगा।
केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण, पर्यावरण मंत्रालय और विभिन्न राज्य सरकारों के आपसी तालमेल से चल रहा यह अभियान इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि अगर इंसान ठान ले, तो वह अपनी पुरानी गलतियों को सुधारकर प्रकृति को उसका पुराना स्वरूप वापस लौटा सकता है।
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